1
क्या एहसान किया है तुमने, ऊँची हवेली में जाकर
जख्मी सांसें लेकर मुझको क्या करना मिलने आकर
साथ निभाने की सब कसमें,पगडण्डी पर छोड़ गयी
साथी दोष नहीं है तेरा,समझ गया हूं ढाई आखऱ
2
सितम की वादियों में गुल नया हमको खिलाना है
चमन को आज माली से खुद हमको बचाना है
नुमाइंदे बने दुश्मन हमारी कौम के, यारो
हरेक आघात का प्रतिघात अब करके दिखाना है
3
कभी फागन,कभी सावन,मुझे हर रूत सताती है
मिलन मावस औ पूनम का,न होता,मां बताती है
शनिचर ले रहा अंगड़ाइयां मेरे मुकद्दर में
कुंवर को आसमानी चाहतें अक्सर सताती हैं
4
हमें देखकर जो खिलती थीं, उन आंखों में नीर क्यूं
अमृत-पान कराया जिसने, उस छाती में पीर क्यूं
भूल गए जो खुद का जीना, अपने बच्चों की खातिर
उनके अरमानों पर प्रीतम, संतानों का तीर क्यूं
5
पिता के पास था लेकिन,गया क्यूं दूर अब समझा
उड़ानें उसको भरनी थीं,पिता मजदूर था समझा
पराई भूमि पर दिन चार क्या बीते,गजब बदला
मगर बेनूर मां की आंख का दस्तूर ना समझा
6
परिन्दे रात को ख्वाबों में आकर गुनगुनाते हैं
नहीं मालूम मेरा गम, या अपना गीत गाते हैं
गुफ्तगू उनकी सुनने को मैं जब भी कान देता हूं
झुकाकर शर्म से पलकें, परिन्दें भाग जाते हैं
7
मुहब्बत गर इबादत थी,तो उसका दाम क्यूं लिक्खा
मिलन की चाहतों का खत,मुझे हर शाम क्यूं लिक्खा
तआल्लुक में दिखानी थी अगर तल्खी तुम्हें प्रीतम
तन्हाई में हथेली पर हमारा नाम क्यूं लिक्खा
8
एक तुम्हारे भोलेपन से,एक तुम्हारी पायल से
जब भी पाला पड़ता है,हम होते हैं कायल से
गांव की पगडण्डी पर लेकर गगरी जब भी चलती हो
देखके नक्शा अंगड़ाई का,हो जाते हैं घायल से
9
समझ कोई नहीं पाया हमारी प्रीत की भाषा
समझ तुम भी न पाओगे,हमारे गीत की भाषा
मुहब्बत को तिजारत मानने वालो जरा सुन लो
जमाने से सुनोगे कल,हमारी जीत की भाषा
10
कैसे कैसे मंजर साथी देखे हैं इन आंखों ने
सुख की तरस रही,लेकिन दुःख जीभर देखे आंखों ने
पल दो पल की खातिर कोई मन-आंगन में बैठ गया तो
तन्हा अगले पल ही हमको देखा है इन आंखों ने
11
मत कहना मुझको कि बादल आज शहर में फिर बरसा है
मत कहना मुझको प्रीतम का आज नहाकर दिल हरसा है
सुखी धरती तेज तपिश में, रोती-गाती रही महीनों
तुम्हीं बताओ धरती खातिर दिल बादल का कब तरसा है
12
दोस्ती काहे जताए जा रहे,कोई बात है ?
इसकी-उसकी क्यों बताए जा रहे,कोई बात है ?
कह दिया मुझको किसी से भी न कोई अब गिला,
ख्वामखा मुझको सताए जा रहे,कोई बात है ?
13
इस मौसम में सबको भाए,ऐसी कोई बात कहां
झुके हुए कंधों पर आए,ऐसा कोई हाथ कहां
बने बनाए सम्बन्धों में,मट्ठा डाल रहे हैं सब
टूटे चुके रिश्तों को जोड़े, ऐसा कोई साथ कहां
14
छोड़ अब चिन्ता फिकर,और काम धन्धा छोड़ दे
दोस्त बन और रात दिन चैटिंग से नाता जोड़ ले
पढ़ भी लोगे तो भला तुम कौन से बिड़ला बनोगे
फ्रैण्ड रिक्वेस्ट भेज कर जीवन-डगर को मोड़ ले
15
जिए ख्वाबों में हंसकर तो कभी ख्वाबों में हम रोये
नहीं मालूम कैसे बीज पिछले जन्म में बोये
अधूरा रह गया अपना हमेशा प्यार का किस्सा
तन्हा बैठ कर हमने खुद अपने अश्क हैं धोये
16
तुम बिन साथी कैसे बताएं, रात कटे ना दिन बीते
तन्हा जीवन निकल रहा है, यादों के आंसू पीते
अम्बर जितना गम पसरा और सागर सी बेचैनी है
समझ गया हूँ ढाई अक्षर, हम हारे और तुम जीते
17
अजब इस देश का अपने हुआ ये हाल है यारों
सियासत ने तबीयत से किया बेहाल है यारों
जिसे मौका मिला, उसने दिया सबको दगा जमकर
हड़पकर माल वतन को कर दिया कंगाल है यारों
18
नमन करते हैं हम गुरुवर, पधारे आज इस आँगन
खिल उट्ठा ह्रदय सबका, खुशियों का झरे सावन
भक्तों के हो रखवाले, गरीबों के मसीहा तुम
मेरे मालिक रहे आबाद, तुम्हारे दो चरण पावन
19
नहीं कोई तमन्ना अब, बची तुमसे मोहब्बत की
नहीं ख्वाहिश रही कोयी, गैरों की इनायत की
कहा मुफलिस मुझे तुने, यही इनाम है काफी
प्रिये हाँ, देख ली ताक़त अमीरों की शराफत की
20
शहर से दूर चलकर अब,चलो ऐसा बनायें घर
जहाँ रंजिश किसी से भी,न हो और ना किसी का डर
खुले दिल से मिलें सबसे,बिताएं चैन का जीवन
उतारें कर्ज मिटटी का,होकर हम ख़ुशी से तर
21
घाट घाट पर जाकर पानी,हमने खूब पिया अब तक
गम, दुश्वारी और उदासी,जीवन खूब जिया अब तक
तेरे मिलन की आस में साथी,सांझ हो गयी जीवन की
जिसको मान सकूँ अपना वो मिला नहीं पिया अब तक
22
तड़पने क्यूँ लगा ये दिल, साँसें कंपकंपाई क्यूँ
तुम्ही ने कुछ किया होगा, हवाएं तेज आई क्यूँ
अचानक कब महक आई, आकर छू गयी तन-मन
सिहर उट्ठा बदन मेरा, ये आँखें डबडबाई क्यूँ.
23
लगाना, तोड़ देना दिल, कहो कैसी इनायत है
कल मुझसे कहा क्यूँ था, मोहब्बत ही इबादत है
जो चाहो फैसला कर लो, मगर सुन लो हमारी भी
है मुजरिम भी तुम्हारा औ तुम्हारी ही अदालत है
२४.
जीवन के तन्हा पथ पर,हार गए चलते चलते
साथी तुम जो साथ निभाते,चल लेते हंसते हंसते
मंजिल तक चलने की कस्में,खाकर हमको छोड़ गए
ये जीना भी क्या जीना है,जब जीएं जलते-जलते
२५
नाम रेत पर लिखकर उसने क्या क्या कसमें खाई थीं
पिछले सावन नाम की मेरे मेंहदी उसने रचाई थी
साथ निभाने वाली थी जो जीवन भर इस आंगन में
तोड़ गयी सब ख्वाब हमारे,रात जो ख्वाब में आई थी