BIG BOSS HEADLINES...

हम भी उनको खत लिखेंगे,पहले खत उनका तो आए


हम भी उनको खत लिखेंगे,पहले खत उनका तो आए
तन्हाई में दिन औ रातें कैसे गुजरीं वे भी बताएं
अपना हाल वही है,जैसा छोड़ गए थे सालों पहले
भींगे तकिए सुबक रहे हैं और आगे क्या हाल सुनाएं

दिन का सूरज,चांद रात का,मेरी कहानी खुद लिखता है
मेरी याद बिना पल उनके, बीते कैसे कुछ तो सुनाएं
व्यथित हृदय लेकर बस्ती में पतझड़-पतझड़ आज कुंवर
वे भी तो कुछ अपनी बस्ती के बासन्ती हाल सुनाएं

यारो,हम भी जान रहे हैं,नहीं कौई पैगाम लिखेगा
चलो कुंवर हम उनके बहाने,बातें कुछ खुद से कर आएं

-कुंवर प्रीतम


क्यों फकत उलझा रहे हो खुद ही अपने रास्ते
घूंट गम के पी रहे हो, क्यों किसी के वास्ते
प्रेम की मंजिल जिन्हें समझ रहे थे,तुंम कुंवर
कहां गए वो,कल तलक थे एक जिनके रास्ते
-कुंवर प्रीतम

मन्नै के लेणो


जी में आवै सो कर जीवड़ा,मन्नै के लेणो
जीणो है जी,मरणो है मर,मन्नै के लेणो

मन में कीं उपजै कोनी,मायतां री सुणै नी
भागै तो भाग,पड़ै तो पड़,मन्नै के लेणो

देखा-देखी झूठी होड,पगां खानी देखै कोनी
आंधी सुरंग है,बड़ै तो बड़,मन्नै के लेणो

धरम-करम,संस्कार मिनखपणो छेड़ै न्हाख्यो
रामाण झूठी रोज तूं,करै तो कर,मन्नै के लेणो

म्हें तो दिनुगै न्हा-धो र बाबू बण त्यार रेऊं
तूं सूगलो सरगड़ो,सड़ै तो सड़,मन्नै के लेणो

गांव रा रिपिया दाब्या,कोथळी नै काठी बांधी
भामाशाह झूठो आज,बणै तो बण,मन्नै के लेणो

गांव में रेवणियो भोळो,बाप लाई कांई जाणै
करमां रा दोस ला़डी,लड़ै तो लड़,मन्नै के लेणो

शैरां में मोज थारी,कोठ्यां री बात न्यारी
पुरखां री हेली नै कै,पड़ै तो पड़,मन्नै के लेणो

-कुंवर प्रीतम

जीवन व्यर्थ गंवाई मत


करसी जिस्यो भरसी भाया,जीवन व्यर्थ गंवाई मत
चादर जित्तोई पग फैलाई,ज्यादा पण फैलाई मत

खोटो टैम चालै लाडी,सगळा भागै पिस्यै लारै
भाया तूं समाई राखी,मिनखपणो गंवाई मत

बडा-बडा फ्लैट बण्या पण,मां-बापां नै वृद्धाश्रम
आपणी छात टूट्योड़ी चोखी,बिस्यो घर चिणाई मत

लाम्बी-लाम्बी डिग्रयां खातर,टाबर नै बिदेस भेजै
सैंस्कार भुलावै जकी,टाबरां नै पढ़ाई मत

मैं तो कीं जाणूं नीं, मिल्योड़ी सीख तन्नै दे दी
मानै तो घणी चोखी,नीं मन्नै तो पजाई मत

-कुंवर प्रीतम

बिनां बुलायां गयां सासरै,समझो नाक कटाणी


सुणो भायळां,कानां में एक बात बताऊं स्याणी
बिनां बुलायां गयां सासरै,समझो नाक कटाणी

लुक्खा रोट जिमावै,अर दै लोटो भर-भर पाणी
माचो घालै लंगड़ियो,सै बूंआ घर की स्याणी
जियां-तियां दिन बितै सिंझ्यां मुंडो फेर सुजावै
आपसरी में सैन करै,ओ डाक्यां जियां खावै

नूंवां-नूंवा जद परणीज्या,ही जोरदार मनुवार
दूध ल्यावता सासू जी कर केसर री बौछार
रात ढल्यां सोयां पेली,मनुवारां ओर घणी होती
लाड लडाती बातां करतीं पछै बूआं सगळीं सोतीं

लेकिन भाया टैम बदळग्यो,कठै रेयी मनुवार
मावस-पुन्यू भेळी कर दै,बुआं घणी हुंस्यार
दुखै माथो एक जणी को,दूज्योड़ी रो नाक चढ्यो
नखरा देख ध्याय भैंरूं ने मैं तो बैरंग घरै बढ्यो

कह्वै कवंर थे बिना बुलायां सासरियै मत जाया
लाडकोड नै न्हाखो छेड़ै, नाक कटै ली भाया
कुंवर प्रीतम

कई दिनां स्यूं देख रैयो हूं,शैरां रा म्है दांव रे
कई दिनां स्यूं जी में आवै,खोजूं चावो ठांव रे
अपणायत अर लाडकोड स्यूं बांथ्यां घालै लोग जठै
बो तो भाया शैर नहीं है,बो तो छै बस गांव रे
कुंवर प्रीतम


मिलणो-भिटणो भूल गयो रै भाई,बदल्या सै संस्कार
आपणला क्यूं भूण्डा लागै,तन्नै सांसी,ढोल गंवार
भायां में ई रळणो-जीणो,उट्ठक-बैठक भायां में
कह्वै कुंवर बै मिनख सोरा,म्हांनै बिस्यां री दरकार
कुंवर प्रीतम

क्यां पर इतरावै रै छोरा,क्यां पर चोंच लड़ावै


क्यां पर इतरावै रै छोरा,क्यां पर चोंच लड़ावै
आखै दिन रामाण मचावै, सैंका बटका खावै
........रै भाया क्यां पर चोंच लड़ावै

गुरजी तन्नै घणी केयी,पर बात समझ नीं आयी
मां-बापां री एक सुणी ना,झूटी राड़ मचायी
बाप बापड़ो भोळो मिनख,तूं जान धिंगाणै खावै
.........रै भाया क्यां पर चोंच लड़ावै

ऊंचा-ऊंचा सुपणा थारा,ब्यां में कठै सचाई
समझ गया सै बातां थारी,तन्नै मिलै नहीं लुगाई
ब्याव करावण खातर,झुठो मुण्डो पड्यो सुजावै
........रै भाया क्यां पर चोंच लड़ावै

कह्वै कुंवर धरती पर रैणो,ब्यां में रेवै भलाई
तूं के जाणै पीर बावळा,फटी नै पैर बिवाई
थांरा साथी ऊंचा चढग्या,नाम-र दाम कमावै
आखै दिन रामाण मचावै,तूं क्यां पर चोंच लड़ावै...
कुंवर प्रीतम




जरा सोचो अगर संसार में सब नेक हो जाएं
मिटाकर दूरियां दिल की यदि सब एक हो जाएं
सियासत से अदालत तक सभी फाकाकशी में हों
फ़कत आंगन रहीम-ओ-राम का जो एक हो जाए
कुंवर प्रीतम

कठिन है राह जीवन की,बड़ा दुश्वार है चलना
कभी लगता है जीने से,कहीं आसान है मरना
मगर जब देखता हूं टिमटिमाती लौ मैं दीपक की
मेरा दिल मुझसे कहता है,ये जीवन है फकत जलना
कुंवर प्रीतम

संस्कार आपणा आडै हरदम आपणला ही आवै


छोरयां में तो बेठै कोनी,छोरा री बातां भावै
इसी मोडर्न छोरयां स्यूं भाया म्हानै राम बचावै
चपर-चपर इंगरेजी बोलै,ओर नहीं की आवै
आखो दिन मोबाइल पर भाया म्हानै राम बचावै
फेसबुकां पर चैटा-चैटी म्हारी समझ नीं आवै
के ठा कांई गोयां हुवै,भाया म्हानै राम बचावै
धरम-करम अर पाठ पुजड़लो ऐनै नहीं सुहावै
करै राम स्यूं हाय-हलो भाया म्हानै राम बचावै
नूवां-नूवां मोडर्न संस्कारां स्यूं बायां है दूर जकी
बै बेट्यां रा भाग बड़ा है, बै ही नाम कमावै
कुंवर कह्वै बायां मत ना नकल करो परजातां री
संस्कार आपणा आडै हरदम आपणला ही आवै
कुंवर प्रीतम

मैं छापै में हूं काम करूं



बिस्वास कर् या मत म्हारै पर
म्हैं छापै में हूं काम करूं
मैं दाम जेब में नीं घाल्यां
सगळां नै बदनाम करूं

भलमानस म्हारै स्यूं कांपै
अर पंच-दरोगा पगां पड़ै
बदमास म्हारा मासी बेटा
मैं भूंडां रो ऊंचो नाम करूं
......मैं छापै में हूं काम करूं

मिंदर में पांव पड़्यां म्हारा
बूढो पंडत घबरावै है
दान-पेटी स्यूं काड नोट
जद हाथां में पकड़ावै है
मैं खबर लिखूं सावळ-सावळ
अर मिन्दरिये नै धाम करूं
जे नइं मिलै की माल मनै
पंडतिऐ नै बदनाम करूं
......मैं छापै में हूं काम करूं

म्हांस्यूं सो गांव रुस्योड़ो पण
म्हानै देख्यां थर-थर कांपै है
बै आपसरी में बात करै
ओ खबरां भुंडी छापै है
पण निजर मिला लै म्हारै स्यूं
इसी बैंकी औकात कठै
मैं राम-राम जे करूं अगर
बै खुद रा भाग मनावै है
घरै जा र डागळै कव्वै नै
डरता कागौल जिमावै है
मैं ओर घणा ई काम करूं
मैं चोखा नैं बदनाम करूं
मैं एक सुणूं नी चोखा री
मैं जेबां में बस दाम भरूं
.....मैं छापै में हूं काम करूं

कुंवर प्रीतम


मुद्दत हो गयी,बैठो यारो,कुछ तो दिल की बात करें
इसकी-उसकी छोड़ के अब कुछ अपनी भी तो बात करें
क्या रक्खा है मीन-मेख में,कौन यहां मुकम्मल है
आसमान की छोड़ो यारो,बस जमीन की बात करो
कुंवर प्रीतम

तेरी आंखें,प्यार की बातें सब कुछ अच्छा लगता है
मेरी हर धड़कन को तेरा सब कुछ अच्छा लगता है
लेकिन सोच रहा हूं जाने कैसा होगा तेरा राजघराना
मुझको टूटी छत वाला घर अपना अच्छा लगता है
कुंवर प्रीतम

1
रै चाल जीवड़ा,उठा फावड़ो,खेतां खानी कर मूंडो
बो मेह तरसै,मैं रोटी नै,है दोन्यां रो सुखो मूंडो.......
हूं सुणी गांव रा टाबरिया शैरां में लूंठा सेठ बजै
अमरीको रेवै पगां तळै,बै उंचा चढ्या बै ओर बढ़ै
गाडी-घोड़ा नोकर-चाकर,सुख सगळा बैंकै भागां में
म्हे देखूं हूं जद बांखानी,तो लागूं मैं खुद नै भुंडो
रै चाल जीवड़ा,उठा फावड़ो,खेतां खानी कर मूंडो........
कुंवर प्रीतम

2
मावड़ली नै मान दिरावण रो संकल्प करां सगळां
आपसरी री बातां सावळ,निज बोली में करां सगळां
जैपर अर दिल्ली में बैठ्या भी चेतैला काल कुंवर
इंगरेजी रो कोड छोड,खुद कायाकल्प करां सगळां
कुंवर प्रीतम

3
जल्म्यो भाया रेतभौम पर,क्यूं इणनै बिसरावै रै
चपर-चपर इंगरेजी बोलै,अर मायड़ अल्डावै रै
राम घणो ई राजी थां पर,गाडी-घोडा सगळा छै
पुरखां रै आंगण री भाया,क्यूं ना ओळ्यूं आवै रै
कुंवर प्रीतम

4
इनली-बीनली गोयां में क्यूं टैम करै खोटी भाया
निकमां बैठ्योड़ानै जग में कुण घालै रोटी भाया
काम बगत सर कर लैणो,निकमो टैम गंवांणो नीं
काम काल रो आज सार लै, उमर घणी छोटी भाया
कुंवर प्रीतम

लो आज प्रशस्ति पढ़ देता हूं,तेरे मन की कह देता हूं


लो आज प्रशस्ति पढ़ देता हूं,तेरे मन की कह देता हूं
धनवान बहुत,विद्वान बहुत जलवे हैं यार जमाने में
नोटों की गिनती कौन करे,रक्खे जो राजघराने में
गाड़ी इतनी कि महीनों में एक बार कदम ना पड़ पाएं
रूतबा इतना कि सात जनम,कोई न वहां तक चढ़ पाए
क्या और कहूं मैं तेरी तो,जग में न कोई सानी तेरा
पर बात कहूं मैं एक खरी,मन बोझिल है प्रिय आज मेरा
जिस भूमि पर तू जन्मा औ जिस मां ने कोख में था पाला
क्यूं खबर न ली उन मांओं की,जिनपे ये शान टिकी लाला
कुंवर प्रीतम

आ प्रशस्ति थारी बांचूं हूं,थारै मन की काडू हूं


आ प्रशस्ति थारी बांचूं हूं,थारै मन की काडू हूं

पढ्यो-लिख्यो विद्वान घणो,तूं लूंठो सेठ भी बाजै है
दिल्ली-जैपर रा सगळा नेता थारै सैन पर नाचै है
कितरा मिंदर ओर धरमसाळां पर है थांरो नाम मंड्यो
कुण माप सकै तनै भाया,तूं सात-सात असमान चढ्यो
रिपिया इत्ता कै गिण नै सकै कोई माल खजानै में
पावळ्यां फू्ट्योड़ी भी थारी,चालै आज जमानै में
गाड्यां-घोड़ा को के कैणो,म्हीनै में नम्बर नीं आवै
लंच करै इंडिया में तू अर डीनर अमरीका मैं खावै
के ओर करां गणगान थारा,तूं मिनख बड़ो धनवान है
पण एक बात है भाया जिस्यूं तूं अब भी अनजान है
आ बात इत्ती कै पुरखां री धरती भी तन्नै याद करै
मायड़ नै जे भूल्यो भाया,तो समझ जनम बरबाद करै
कैबत में केग्या कद पुरखा,आ भोम आपणी मावड़ली
मालखजानो याद रेवै, क्यूं आवै नीं इण री यादड़ली
कुंवर प्रीतम

केंद्र पर दबाव की सियासत कर रहीं ममता


प्रकाश चण्डालिया

पेट्रोल की कीमतों में  हालिया बढ़ोतरी पर ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया मीडिया, खासकर पं. बंगाल के मीडिया में सुर्खियों में स्थान पा गयीं, लेकिन जमीनी हकीकत से वास्ता रखने वालों को मालूम है कि उनकी तथाकथित कड़े शब्दों वाली प्रतिक्रिया महज शब्दों की जुगाली है।
ममता बनर्जी यूपीए की सबसे शक्तिशाली साझेदार हैं। उनकी पार्टी के सांसदों की संख्या यूपीए की मजबूती का आधार हैं। दूसरी ओर, पंबंगाल में उनकी पार्टी का शासन पहली बार सत्ता में आया है, और इसमें विधायकों की बौनी संख्या के बावजूद एक सत्य तो है ही कि कांग्रेस उसमें साझेदार है। आंकड़े गवाह हैं कि यदि ममता बनर्जी केंद्र से समर्थन वापस ले ले, तो कांग्रेस हिल जाएगी, लेकिन बंगाल का आलम यह है कि कांग्रेस ममता से समर्थन ले ले तो उनका बाल भी बांका न होगा।
ममता बनर्जी के तेवरों में हालिया बदलाव के मद्देनजर यह सहज ही समझा जा सकता है कि जिस ममता बनर्जी ने एक दौर में लोकसभा स्पीकर पर अपना काला शॉल फेंक मारा था, या अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को हमेशा दबाए रखा था, वे अब थोड़ी समझदारी से राजनीति करती हैं। बंगाल में शासन में आने के बाद ममता बनर्जी में यह बदलाव उऩकी सकारात्मक और मजबूत सोच का परिचायक है। ऐसे में लगता नहीं कि तेल के दाम बढ़ाने पर जो प्रतिक्रिया सामने आयी है, उसमें कोई सचाई है। ममता ने लोक-लिहाज से महंगाई से त्रस्त जनता को खुश करने के लिहाज से बयान दिया है कि इस मसले पर वे दिल्ली जाकर बात करेंगी। जबकि इसके पहले उन्हीं की पार्टी के सांसदों ने कोलकाता में एक बैठक कर पार्टी के निर्णय का अधिकार ममता बनर्जी को दे दिया। चर्चा यहां तक रही कि तृणमूल के सभी प्रतिनिधि केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देंगे।
ममता बनर्जी को मालूम है कि इस्तीफे या केंद्र से हाथ खींचने से उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला। वैसे भी कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी के साथ उनकी केमिस्ट्री खूब जम रही है। वामपंथियों के शासनकाल में बेतरह कंगाल हो चुके राज्य में कर्मचारियों की तनख्वाह का टोटा है। कोलकाता नगर निगम की हालत खस्ता है। ठेकेदारों का समय से भुगतान नहीं हो रहा है। कई विशेष प्रकल्पों का काम इसीलिए बाधित भी हो रहा है।
राजनैतिक धझरातल पर ममता बनर्जी ने गोरखा समस्या को हालिया तौर पर शान्त कर दिया है। जंगलमहल में नक्सली आन्दोलन के खिलाफ वे आक्रामक अभियान का मूड बना रही हैं। लेकिन, सबसे पहली बात है कि आर्थिक रूप से बदहाल राज्य को चलाने के लिए अभी जितने धन की आवस्यकता है, वह ममता को सहोदर विचारों वाला दल ही दे सकता है। वैसे भी अभी लोकसभा का कार्यकाल लम्बा है, ममता बनर्जी का पूरा ध्यान राज्य की राजनीति पर केंद्रित है। उन्हें मालूम है कि केंद्र पर दबाव की राजनीति से ही धन हासिल किया जा सकता है। फकत इसी सोच के चलते उन्होंने केंद्र पर तेल के दाम बढ़ाने को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है,लेकिन अन्दरूनी सचाई यह है कि वे केंद्र से पूरी तरह समर्थन वापस लेने जैसा कोई निर्णय नहीं लेंगी। सिंगुर मसले पर जिस तरह उन्होंने टाटा के खिलाफ मोरचा खोला, उससे गरीब जनता ने तालियां जरूर बजायीं, पर इससे औद्योगिक हलकों में ममता की साख घटी ही है।
वामपंथियों के 34 वर्षों के शासन में हड़ताल का पर्याय बन चुके राज्य में अभी औद्योगिक स्तर पर ममता कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी हैं। अल्पसंख्यक मतदाताओं को लुभाने के लिए जगह-जगह खातूनी लिबास में दुआ करतीं ममता की तस्वीरें मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित कर सकती हैं, पर ऐसी नौटंकी से राज्य के खजाने में धन नहीं आने वाला।
बंगाल को अभी हजारों करोड़ के धन की आवश्यकता है। दार्जिलिंग को स्विट्जरलैण्ड और कोलकाता को लंदन बनाने का सपना देखने वाली ममता बनर्जी आने वाले दिनों में केंद्र से अधिकाधिक धन प्राप्त करने की योजनाएं बना रही हैं, और तेल के दाम बढ़ाने पर चेतावनी के लहजे में दी गयी धमकी उसी का नतीजा है।
सोनिया गांधी के साथ मजबूत सम्बन्ध ममता बनर्जी की अनमोल धरोहर है। यूपीए में सोनिया गांधी के इशारों और फैसलों से ऊपर कोई नहीं होता, यह ममता बखूबी जानती हैं। और सोनिया राजी रहती हैं, तब तक येन-केन दबाव बनाकर राज्य के लिए धन प्राप्त करना ज्यादा आसान है। केंद्र से समर्थन वापस लेने की बात तो ममता बनर्जी के जेहन में दूर-दूर तक नहीं है। हां, मीडिया के सामने ऐसे बयान देकर सूर्खियों में रहना सहज होता है।
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लेखक कोलकाता से प्रकाशित सांध्य दैनिक राष्ट्रीय महानगर के प्रधान सम्पादक हैं
कठिन है राह जीवन की,बड़ा दुश्वार है चलना
कभी लगता है जीने से,कहीं आसान है मरना
मगर जब देखता हूं टिमटिमाती लौ मैं दीपक की
मेरा दिल मुझसे कहता है,ये जीवन है फकत जलना
कुंवर प्रीतम

मंदिर-वंदिर,मन्नत-वन्नत सब बेमतलब बेमानी रे
दर-दर मत्था फोड़ के हमने बात यही बस जानी रे
नाम धर्म का लेकर संतों ने भी धंधा खोल लिया है
वेद-पुराण पर पाखंडों की चलती निज मनमानी रे।
सबरी,केवट और सुदामा की अब पूछ कहां होती है
मालिक की नीयत भी छप्पन भोग पे है बिक जानी रे
जीना है तो शान से खुद की ताकत के बल पे जीना
देख कुंवर फिर मालिक की भी ताकत है झुक जानी रे।
कुंवर प्रीतम



प्रणाम तुम्हें करता हूं मां,जन्म दिया,इंसान बनाया
अपनी छाती से चिपकाकर मुझको अमृतपान कराया
छुटपन के दिन याद आते हैं,कितना कष्ट उठाया तुमने
मैंने लाख रुलाया,फिर भी तुमने मां भरपूर हंसाया
जीवन की हर सांसों पर मां तेरा ही है नाम लिक्खा
तुमको उपमा क्या दूं मैं मां, तुझमें है भगवान समाया
कुंवर प्रीतम




व्यस्तताएं दोस्ती में बीज कैसे बो गयीं
चाहतें मिलने-मिलाने की भी जैसे खो गयीं
वक्त के इस दांव को समझ नहीं पाए हमीं
आंधियां ऐसी चलीं कि दोस्ती भी धो गयीं
कुंवर प्रीतम


हार चुके जो निज जीवन से,उनमें जोश जगाए
भेदभाव सब ऊंच-नीच के सारे आज भगाए
दूर करे अंधियार जगत के, आलोकित हों सारे
काश कुंवर से आज शारदे ऐसा काव्य रचाए
कुंवर प्रीतम

दीवाली दस फीसद की,नब्बे फीसद रोता है


छोड़ पुरानी रीतियां त्याग सभी दस्तूर
देख तुम्हारे पास ही खड़ा विवश मजदूर
खड़ा विवश मजदूर,लिए तन पर केवल चिथड़े
भूखी आंखें ताक रही हैं केवल रोटी के टुकड़े
मालिक के घर में भी भइया भेदभाव होता है
दीवाली दस फीसद की,नब्बे फीसद रोता है
कुंवर प्रीतम

पैसा सबका बाप


यार गजब ताकत पैसे में,पैसा सबका बाप
जिसकी जैसी जेब है,वैसा उसका माप
वैसा उसका माप,कि बाबू पैसा आल इन वन
पैसा पास नहीं तो तय है मुरझाएगा मन
लाख पढ़ो,गुणवान बनो,बिन पैसे कुछ न होवे
अनपढ़ झूम रहा मस्ती में,ज्ञानी घर में रोवे
कह प्रीतम कविराय,रचा मालिक ने खेल निराला
मेहनतकश को मौत मिले पर मिलता नहीं निवाला
कुंवर प्रीतम

है अगर रिश्ता हमारा सूर्य के परिवार से
दो कदम आगे बढ़ें और घर भरें उजियार से
दीप उम्मीदों के जलाएं,रोशनी हरसू करें
कब तलक डरते रहेंगे हम घने अंधियार से
कुंवर प्रीतम

जागता है रात को अब कौन किसके वास्ते
मंजिलें सब की जुदा और सबके अपने रास्ते
मुद्दतों जिनके ख्यालों में जगे हम रात भर
चैन से वो से रहे है अब किसी के वास्ते
कुंवर प्रीतम


जख्मों की जिगर से है ये कैसी जुगलबन्दी
है दर्द मेरे दिल में,और वो है बेदर्दी
आंखों की नमी को भी क्यूं समझ न पाया वो
हाय,आज मुहाफिज ने ही जुल्म की हद कर दी
कुंवर प्रीतम

सोच रहा हूं,दुनिया की है कैसी कैसी रीत गजब
बेखुद और दीवाना करती, कैसी कैसी प्रीत गजब
धरती पर ना पांव टिकें और अम्बर लगता मुट्ठी में
प्रियतम के लब गाते हैं जब मीठे-मीठे गीत गजब
कुंवर प्रीतम


हिम्मत से मत हार रे पगले,रोना-गाना छोड़
खुद के दम पर बढ़ आगे,भाग्य बंचाना छोड़
मेहनत और साहस के आगे झुक जाएगा ईश्वर भी
मत बेचैन रहा कर,दिन-दिन मंदिर जाना छोड़
कुंवर प्रीतम


विधाता भी गजब संसार में अपना खेल दिखाता है
जिसे था भूलना हमको, उसी की याद दिलाता है
रावण मारकर श्री राम ने आलोकित किया जग को
मगर हम हैं कि बस हमको अंधेरा याद आता है
कुंवर प्रीतम


उल्फत,अरमां,तड़प,बेबसी और चाहत
तौबा कर इन सबसे,वरना होगा आहत
फंसने का ये जाल बिछाया खुद ईश्वर ने
खो बैठेगा चैन रे पगले,नहीं मिलेगी राहत
कुंवर प्रीतम

खुदगर्जों की इस दुनिया में अपनी क्या औकात भला
बेईमान सब गुंबद पर हैं, नींव की क्या औकात भला
भाई-बन्धु, रिश्ते-नाते, ईश्वर तक है लेन-देन में
कुंवर फकीरा देख रहा पर, उसकी क्या औकात भला
कुंवर प्रीतम


हाय,शहर का जीवन कैसा दुर्गम और दुश्वार हुआ
कदम कदम पे पंगा है,हर शख्स यहां लाचार हुआ
दो पैसे की खातिर बुनते झूठ का तानाबाना सब
नहीं किसी से नाता भइया,हर रिश्ता बाजार हुआ
कुंवर प्रीतम

दुनिया बनाने वाले से सिर्फ एक सवाल


जन्नत में बैठकर
दुनिया चलाने वाले से
जब कभी
एक सवाल पूछा जाएगा
भागता फिरेगा
तरबतर पसीने से
मगर जवाब दे न पाएगा

सवाल कोई इतना टेढ़ा भी नहीं
सीधा है,सपाट है

फकत इतना जानना है
मुझे उससे,
हां दुनिया बनाने वाले से
कि महंगाई के दौर में
और आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी
इस धरा पर क्या
अपना सिंहासन छोड़कर आएगा

और आम आदमी की तरह
एक दिन
हां,फकत एक दिन
इस लोक में
जीवन बसर कर पाएगा।

कुंवर प्रीतम


हमको तो लगता नहीं,तुमको लगे तो लगे
हमको ठग सकते नहीं,तुम ठगे तो ठगे
दीप बुझाकर देश की आशा और उम्मीदों के
दिल्ली चैन से सो रही, जनता जगे तो जगे
कुंवर प्रीतम

आओ सुनाऊं गीत प्रीत का,नेह से इसका नाता है
ये हमको भी भाता है और ये तुमको भी भाता है
प्यार,मोहब्बत और चाहत के भाव भरे हैं शब्दों में
तन्हाई में गीत हमारा छिप-छिप हर दिल गाता है
कुंवर प्रीतम

अम्बे, रहमतें तेरी कभी क्या पा नहीं सकता
मेरा दिल गीत खुशियों के कभी क्या गा नहीं सकता
तुम्हारे आगमन से हो रहा उनका हृदय रौशन
गरीबों पे तुम्हारा दिल कभी क्या आ नहीं सकता
कुंवर प्रीतम

नौराते आ गए मैय्या,धरा पर आज आयी हैं
सुना भक्तों की खातिर मां,कुछ न कुछ तो लायी हैं
अमीरों के घरों में रोशनी पर रोशनी अम्बे
गरीबों को मगर देने,भवानी क्या क्या लायी है
कुंवर प्रीतम


मूड खराब है यार,कहो मत कुछ भी मुझसे आज
रहने दो खामोश मुझे,अब बात न होगी कोई आज
ये भी कोई बात हुयी के हम ही हम इजहार करें
ढाई आखर कहने में क्यों प्रीतम उनको आयी लाज
कुंवर प्रीतम
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पहेली मत बुझाओ यार हमसे सीधी-सीधी बात करो
मेरे-तेरे-सबके दिल को भाए,वैसी बात करो
लटके-झटके और फरेबी बातों में उलझाओ मत
प्रीतम से गर प्रीत निभानी,प्रीतम-प्रीतम बात करो
कुंवर प्रीतम

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सच कहता हूं भाई मेरे,वर्षों हुए नहाए
पानी पर भी टैक्स लगे है,क्योंकर नोट गंवाएं
नहीं नहाने के भी भइया लाभ बहुत मिलते हैं
लाइन में लगने पर, कोई पास फटक न पाएं

और बहुत से लाभ हैं बन्धु वर्षों नहीं नहाने के
इसीलिए जमाए हमने सारे मैल जमाने के
चलो चलें सरकारी दफ्तर,बिना नहाए यार कभी
नाक सिकोड़ेगा अफसर पर काम करेगा तुंरत अभी

रोज नहाने वाले शहरी साधारण इंसान हैं
नहीं नहाने वाला मंदिर में बैठा भगवान है
चार टके की साबुन से बस मैल छूटेगा तन का
आओ साथी,नहीं नहाएं,पर मैल मिटाएं मन का
कुंवर प्रीतम

मुक्तक
चलो फिर गांव की जानिब,शहर अच्छा नहीं लगता
बेगानों के नगर में अब गुजर अच्छा नहीं लगता
यहां नफरत निगाहों में,वहां रिश्ते मोहब्बत के
बसर अब दूर मिट्टी से,कुंवर अच्छा नहीं लगता
कुंवर प्रीतम


हुयी मेहर तुम्हारी शारदे,नम हुयी आंखें
जो पहुंचे गांव के आंगन,नम हुयी आंखें
किसी की चोट खाकर क्या,किसी को चोट देकर भी
हुआ जख्मी ये दिल पावन, नम हुयी आंखें
कुंवर प्रीतम


दुनिया का दस्तूर गजब,समझ सका है कौन यहां
पल में छांव, धूप अगले पल, समझ सका है कौन यहां
चार दिनों के रैन बसेरे की खातिर क्या ख्वाब बुनें
तन्हाई के आलम में हम रहते हरदम मौन यहां
कुंवर प्रीतम


नंगी आंखों से देखा जब हमने दुनिया का मंजर
मुख में वाणी मीठी लेकिन पीठ के पीछे था खंजर
आज यही आलम दुनिया में,हरसू पसरा है प्रीतम
जिस धरती पर नाज था हमको, आज वही बंजर-बंजर
कुंवर प्रीतम


कैसे कैसे खेल दिखाते हैं संसद में नेताजी
औंधे मुंह गिर जाने को भी जीत बताते नेताजी
संविधान की शपथ पढ़ी पर देश बेचने निकल पड़े
जाने किन-किन देशों में हैं माल जमाते नेताजी
कुंवर प्रीतम


लोकपाल ने याद दिला दी भ्रष्टों को उऩकी नानी
लेकिन पूरी जीत हो गयी, कहना होगा बेमानी
संसद में बैठे लोगों की, हरकत पर विश्वास नहीं
नयी कमेटी होगी सच्ची, ऐसा है आभास नहीं
कुंवर प्रीतम

रूकावट और बाधाएं हमें कब तोड़ पायी हैं
निराशा की घटाएं भी हमें कब छोड़ पायी हैं
फिकर क्योंकर करूं ऐ जिन्दगी तेरे बिखरने की
दुआ मां-बाप की मैंने सदा बेजोड़ पायी हैं
कुंवर प्रीतम

सोचो अगर हम भी,तुम जैसे हो गए होते
वादा करते,कसमें खाते,फिर मुकर गए होते
कैसे कटतीं रातें तन्हाइयों में खुद से पूछो
कुंवर अगर तुम्हारे ख्वाब में न गए होते
कुंवर प्रीतम

फकीरों की दुआओं का असर जो कम हुआ होता
तुम्हारी जिन्दगी में यार गम ही गम हुआ होता
बुलन्दी चार दिन की क्या मिली उड़ने लगे प्रीतम
ऐ मौला, काश उसके पंख में भी दम हुआ होता
कुंवर प्रीतम




क्यों कुंठा से घिरे हुए हो,क्या रक्खा है क्रन्दन में
अपनी भाषा बोलो प्यारे,क्या रक्खा है लन्दन में
अंग्रेजों की चाट के जूठन, क्या पाओगे बोलो जी
भारतवर्ष का कण-कण महके,जैसे खुशबू चन्दन में
कुंवर प्रीतम


दुःख,दुश्वारी और गरीबी से जिनका नाता नहीं
सब कुछ हो सकते मगर जीवन के ज्ञाता नहीं
दौलत और शोहरत वाले सब होंगे रुतबेदार मगर
तौबा तौबा ऐसा जीवन प्रीतम को भाता नहीं
कुंवर प्रीतम



ऐ दिल,मत बेवफा की खबर लिया कर
दर्द सह, मत दवा की खबर लिया कर
क्या भरोसा जिन्दगी फिर खा जाएं फरेब
छोड़ चौखट,मत आहटों की खबर लिया कर
कुंवर प्रीतम


बेवफा जिन्दगी का साज-ओ-सामां ले चले
अलविदा ऐ दोस्तो,सब अपने अरमां ले चले
कब तलक तन्हाइयों का साथ हम देते कहो
बेबसी के साथ प्रीतम दिल-ए-नादां ले चले
कुंवर प्रीतम

कैसा-कैसा बोझ ये जख्मी दिल ढोता है बेचारा
मीत मिले,मिलकर बिछड़े,बेबस दिल जाता मारा
सदियों का ये खेल कुंवर,आज नयी कोई बात नहीं
मुंह,आंखें,जज्बात के चलते दिल हरदम हारा-हारा
कुंवर प्रीतम


जिनको पलकों पर रखा और बातों पर एतबार किया
आज उसी साथी ने दिल पर एक करारा वार किया
हाय हमारे भोलेपन का हुआ नहीं एहसास उन्हें
जिनके भोलेपन पे प्रीतम ने खुद को लाचार किया
कुंवर प्रीतम


रात तन्हाई में गुजरी और दिन में सबके पहरे थे
दिल पिंजरे में कैद पड़ा था,पहरे इतने गहरे थे
कतरा-कतरा दर्द जिगर का,आब-ए-चश्म हुआ फिर भी
नमक घाव पर देने वाले,पत्थर-पत्थर चेहरे थे
कुंवर प्रीतम



मुद्दत की चाहतों का आज इम्तिहान है
मैं भी परेशान और वो भी परेशान है
हर सिम्त पहरे बिठा दिए रकीबों ने क्या करें
जमीं तो जमीं, आसमां भी निगहबान है
कुंवर प्रीतम

हिन्दुस्तान की अपनी भाषा का कब लहरेगा परचम


कैसे गर्व करें हिन्दी पर,गांव-गरीब की भाषा है
जन-जन बोले भाषा अपनी,यह अपनी अभिलाषा है
दिवस एक हिन्दी का,लेकिन इंग्लिश चलती सालों-साल
नेता-अभिनेता हिन्दी के, इंग्लिश बोल फुलावें गाल
कामकाज और बोलचाल में,हरसू इंग्लिश का दमखम
हिन्दुस्तान की अपनी भाषा का कब लहरेगा परचम
प्रेमचन्द,प्रसाद,दिनकर ने जिसको समृद्ध किया
उस हिन्दी का मार्ग आज की पीढ़ी ने अवरूद्ध किया
इंग्लिश जैसे नार परायी,या होटल की नान-दाल
हिन्दी लेकिन माता अपनी,यही करेगी हमें निहाल
आओ बन्धु,आज शपथ लें,परचम इसका लहराएंगे
बोलचाल और कामकाज में हिन्दी ही अपनाएंगे
कुंवर प्रीतम

मुहब्बत में महक गुल की,इसे तुम खार मत करना
नसीबों से मिला प्रीतम,उसे लाचार मत करना
मिटाना हो मिटा देना,मगर इतना कहा सुन लो
कुंवर की चाहतों को भूल कर अखबार मत करना
कुंवर प्रीतम

जिंदगी जब निराशा में हमें दुश्वार लगती है
शिकन चेहरे पे,और आंखों से अश्रुधार चलती है
दुआएं गांव से मां की लिवा लाती हवाएं फिर
कुंवर की जिन्दगी को इक नयी रफ्तार मिलती है
कुंवर प्रीतम

मुक्तक


जरा सी बात पे नाराज,मेरे यार क्या होना
गुलों की क्यारियों में बीज क्योंकर खार के बोना
करम सदियों किए होंगे,तभी प्रीतम मिला तुमको
कुंवर को भूल मत साथी, पड़ेगा उम्र भर रोना
कुंवर प्रीतम

मिलन की चाहतों में दिन भला हम कब तलक काटें
फरेबी वायदों का गम कहो,कहकर किसे बांटे
इलाही तल्खियां उसकी कहर ढातीं गजब मुझ पर
पेंचोंखम मुहब्बत के, बताओ किस तरह पाटें
कुंवर प्रीतम

नींद नहीं आती, लोरी आज सुना दे फिर मैय्या
हरसू जख्मी मंजर,लोरी आज सुना दे फिर मैय्या
आंख लगे तो दहशत बम की,छा जाती है ख्वाबों में
परियां, चांद, सितारे वाली लोरी आज सुना दे मैय्या
कुंवर प्रीतम

पहेली बनके हमारे सामने जो शख्स खड़ा है
दो वक्त की रोटी के लिए सालों लड़ा है
दिखता है फटेहाल औ छत भी नहीं सर पे
कुंवर की नज़र में शख्स संसद से बड़ा है
कुंवर प्रीतम

मेरी बिटिया मुझे जब प्यार से बाबा बुलाती है
औ तुतले बोल से प्यारी व्यथा दिन की सुनाती है
मैं सब कुछ भूलकर अपने,नए एहसास गढ़ता हूं
बिटिया खुद मुझे झुले खयालों के झुलाती है
कुंवर प्रीतम

मस्त फकीरा जीवन है,पर ख्वाब सुहाने रखता हूं
अपने पुरखों की तहजीबें,मैं सिरहाने रखता हूं
जिसको शोहरत कहते हो तुम,वो मेरे पैताने में
अपने दिल की कुटिया में कई राजघराने रखता हूं
कुंवर प्रीतम

बताएं यार क्या तुमको, हमारे गांव की मस्ती
हरेक त्योहार पर खलती हमारे गांव की मस्ती
शहर में हम भले लाखों बरत लें जेब से अपनी
मगर गुलजार जेहन में ,हमारे गांव की मस्ती
कुंवर प्रीतम

गणपति बप्पा, सुनो ध्यान से घर तो सबके आना
लेकिन लोकपाल का डर है, लड्डू कम ही खाना
लेन-देन का टेंडर अबकी, कम ही तुम भरवाना
वरना तय है फिर अनशन पर अन्नाजी का आना
सवामणि के चक्कर में जो फंसे अगर लम्बोदर तुम
तय मानो फिर आरटीए के पंदे में फंस जाना
कुंवर प्रीतम

मिलन की चाहतों में दिन भला हम कब तलक काटें
फरेबी वायदों का गम कहो,कहकर किसे बांटे
इलाही तल्खियां उसकी कहर ढातीं गजब मुझ पर
पेंचोंखम मुहब्बत के,बताओ किस तरह पाटें
कुंवर प्रीतम

मुक्तक


मेरी बिटिया मुझे जब प्यार से बाबा बुलाती है
औ तुतले बोल से प्यारी कथा दिन की सुनाती है
मैं सब कुछ भूलकर अपने,नए एहसास गढ़ता हूं
उम्मीदों के नए झूले,प्रकृति खुद झुलाती है
कुंवर प्रीतम




मुक्तक



चलो फिर गांव की जानिब,शहर अच्छा नहीं लगता
बेगानों के नगर में अब गुजर अच्छा नहीं लगता
यहां नफरत निगाहों में,वहां रिश्ते मोहब्बत के
बसर अब दूर मिट्टी से,कुंवर अच्छा नहीं लगता
कुंवर प्रीतम

हुयी मेहर तुम्हारी शारदे,नम हुयी आंखें
जो पहुंचे गांव के आंगन,नम हुयी आंखें
किसी की चोट खाकर क्या,किसी को चोट देकर भी
हुआ जख्मी ये दिल पावन, नम हुयी आंखें
कुंवर प्रीतम


दुनिया का दस्तूर गजब,समझ सका है कौन यहां
पल में छांव, धूप अगले पल, समझ सका है कौन यहां
चार दिनों के रैन बसेरे की खातिर क्या ख्वाब बुनें
तन्हाई के आलम में हम रहते हरदम मौन यहां
कुंवर प्रीतम

नंगी आंखों से देखा जब हमने दुनिया का मंजर
मुख में वाणी मीठी लेकिन पीठ के पीछे था खंजर
आज यही आलम दुनिया में,हरसू पसरा है प्रीतम
जिस धरती पर नाज था हमको, आज वही बंजर-बंजर
कुंवर प्रीतम


कैसे कैसे खेल दिखाते हैं संसद में नेताजी
औंधे मुंह गिर जाने को भी जीत बताते नेताजी
संविधान की शपथ पढ़ी पर देश बेचने निकल पड़े
जाने किन-किन देशों में हैं माल जमाते नेताजी
कुंवर प्रीतम

लोकपाल ने याद दिला दी भ्रष्टों को उऩकी नानी
लेकिन पूरी जीत हो गयी, कहना होगा बेमानी
संसद में बैठे लोगों की, हरकत पर विश्वास नहीं
नयी कमेटी होगी सच्ची, ऐसा है आभास नहीं
कुंवर प्रीतम

गणपति बप्पा, सुनो ध्यान से घर तो सबके आना


गणपति बप्पा, सुनो ध्यान से घर तो सबके आना
लेकिन लोकपाल का डर है, लड्डू कम ही खाना
लेन-देन का टेंडर अबकी, कम ही तुम भरवाना
वरना तय है फिर अनशन पर अन्नाजी का आना
सवामणि के चक्कर में जो फंसे अगर लम्बोदर तुम
तय मानो फिर आरटीए के फंदे में फंस जाना
कुंवर प्रीतम

मुक्तक

मस्त फकीरा जीवन है,पर ख्वाब सुहाने रखता हूं
अपने पुरखों की तहजीबें,मैं सिरहाने रखता हूं
जिसको शोहरत कहते हो तुम,वो मेरे पैताने में
अपने दिल की कुटिया में कई राजघराने रखता हूं
कुंवर प्रीतम

मुक्तक


बताएं यार क्या तुमको, हमारे गांव की मस्ती
परब त्योहार पर खलती हमारे गांव की मस्ती
शहर में बैठकर लाखों बरत लें जेब से अपनी
मगर गुलजार जेहन में ,हमारे गांव की मस्ती

कुंवर प्रीतम

मुक्तक

चलो फिर गांव की जानिब,शहर अच्छा नहीं लगता
बेगानों के नगर में अब गुजर अच्छा नहीं लगता
यहां नफरत निगाहों में,वहां रिश्ते मोहब्बत के
बसर अब दूर मिट्टी से,कुंवर अच्छा नहीं लगता
कुंवर प्रीतम


हुयी मेहर तुम्हारी शारदे,नम हुयी आंखें
जो पहुंचे गांव के आंगन,नम हुयी आंखें
किसी की चोट खाकर क्या,किसी को चोट देकर भी
हुआ जख्मी ये दिल पावन, नम हुयी आंखें
कुंवर प्रीतम


दुनिया का दस्तूर गजब,समझ सका है कौन यहां
पल में छांव, धूप अगले पल, समझ सका है कौन यहां
चार दिनों के रैन बसेरे की खातिर क्या ख्वाब बुनें
तन्हाई के आलम में हम रहते हरदम मौन यहां
कुंवर प्रीतम


नंगी आंखों से देखा जब हमने दुनिया का मंजर
मुख में वाणी मीठी लेकिन पीठ के पीछे था खंजर
आज यही आलम दुनिया में,हरसू पसरा है प्रीतम
जिस धरती पर नाज था हमको, आज वही बंजर-बंजर
कुंवर प्रीतम


कैसे कैसे खेल दिखाते हैं संसद में नेताजी
औंधे मुंह गिर जाने को भी जीत बताते नेताजी
संविधान की शपथ पढ़ी पर देश बेचने निकल पड़े
जाने किन-किन देशों में हैं माल जमाते नेताजी
कुंवर प्रीतम


लोकपाल ने याद दिला दी भ्रष्टों को उऩकी नानी
लेकिन पूरी जीत हो गयी, कहना होगा बेमानी
संसद में बैठे लोगों की, हरकत पर विश्वास नहीं
नयी कमेटी होगी सच्ची, ऐसा है आभास नहीं
कुंवर प्रीतम

चलो फिर गांव की जानिब,शहर अच्छा नहीं लगता
बेगानों के नगर में अब गुजर अच्छा नहीं लगता
यहां नफरत निगाहों में,वहां रिश्ते मोहब्बत के
बसर अब दूर मिट्टी से,कुंवर अच्छा नहीं लगता
कुंवर प्रीतम

मुक्तक


नंगी आंखों से देखा जब हमने दुनिया का मंजर
मुख में वाणी मीठी लेकिन पीठ के पीछे था खंजर
आज यही आलम दुनिया में,हरसू पसरा है प्रीतम
जिस धरती पर नाज था हमको, आज वही बंजर-बंजर
कुंवर प्रीतम


कैसे कैसे खेल दिखाते हैं संसद में नेताजी
औंधे मुंह गिर जाने को भी जीत बताते नेताजी
संविधान की शपथ पढ़ी पर देश बेचने निकल पड़े
जाने किन-किन देशों में हैं माल जमाते नेताजी
कुंवर प्रीतम

मुक्तक


1
मिटाकर बस्तियां अपना बनाया घर तो क्या मानी
मुकद्दर के यही मानी अगर हैं तो हैं बेमानी
रहेगी उम्र भर रौशन ये दुनिया शोहरतों वाली
अगर ये सोच रक्खा है तो है ये सोच बेमानी
कुंवर प्रीतम

2
नयन में नीर,दिलों में पीर,मिलन क्या अब नहीं होगा
जमाने की चुभन जालिम,मिलन क्या सच नहीं होगा
खिली कलियां मुहब्बत की,रची है हाथ में मेंहदी
मिलन फिर भी न होगा तो,सितम क्या तब नहीं होगा
कुंवर प्रीतम

3
अपने मुल्क के नेता कितने,सीधे-कितने भोले हैं
देश डकार गए सारा मुंह फिर भी अपना खोले हैं
देख सियासत का मंजर अब पूछ रही भारत माता
लाल बहादुर कहां गए औ कहां बसन्ती चोले हैं
कुंवर प्रीतम

4
आज का मंजर न जाने रास क्यूं आता नहीं
हाल दिल्ली का किसी को अब कहीं भाता नहीं
जम्हूरियत की धज्जियां उड़ा रहे खुद रहनुमा
क्यूं गुलिस्तां को बचाने अब कोई आता नहीं
कुंवर प्रीतम

5
चार दिनों की खातिर मैडम घर से बाहर क्या गयीं
आफत सारे जग की,माथे कांग्रेस के आ गयी
एक हुंकार भरी अन्ना ने,जाग उठी सारी जनता
भ्रष्टाचारी कुनबे को खुद उसकी सियासत खा गयी
कुंवर प्रीतम

6
मान देश का क्या होता है, दिल्ली वाले क्या जानें
भूख, गरीबी और महंगाई, दिल्ली वाले क्या जानें
जनता के पैसे से जिनको मिली कोठियां, मंत्री पद
जनता की दुश्वारी, दंभी दिल्ली वाले क्या जानें
कुंवर प्रीतम

26.8.2011

कुंवर प्रीतम के २५ मुक्तक



1
क्या एहसान किया है तुमने, ऊँची हवेली में जाकर
जख्मी सांसें लेकर मुझको क्या करना मिलने आकर
साथ निभाने की सब कसमें,पगडण्डी पर छोड़ गयी
साथी दोष नहीं है तेरा,समझ गया हूं ढाई आखऱ

2
सितम की वादियों में गुल नया हमको खिलाना है
चमन को आज माली से खुद हमको बचाना है
नुमाइंदे बने दुश्मन हमारी कौम के, यारो
हरेक आघात का प्रतिघात अब करके दिखाना है

3
कभी फागन,कभी सावन,मुझे हर रूत सताती है
मिलन मावस औ पूनम का,न होता,मां बताती है
शनिचर ले रहा अंगड़ाइयां मेरे मुकद्दर में
कुंवर को आसमानी चाहतें अक्सर सताती हैं

4
हमें देखकर जो खिलती थीं, उन आंखों में नीर क्यूं
अमृत-पान कराया जिसने, उस छाती में पीर क्यूं
भूल गए जो खुद का जीना, अपने बच्चों की खातिर
उनके अरमानों पर प्रीतम, संतानों का तीर क्यूं

5
पिता के पास था लेकिन,गया क्यूं दूर अब समझा
उड़ानें उसको भरनी थीं,पिता मजदूर था समझा
पराई भूमि पर दिन चार क्या बीते,गजब बदला
मगर बेनूर मां की आंख का दस्तूर ना समझा

6
परिन्दे रात को ख्वाबों में आकर गुनगुनाते हैं
नहीं मालूम मेरा गम, या अपना गीत गाते हैं
गुफ्तगू उनकी सुनने को मैं जब भी कान देता हूं
झुकाकर शर्म से पलकें, परिन्दें भाग जाते हैं

7
मुहब्बत गर इबादत थी,तो उसका दाम क्यूं लिक्खा
मिलन की चाहतों का खत,मुझे हर शाम क्यूं लिक्खा
तआल्लुक में दिखानी थी अगर तल्खी तुम्हें प्रीतम
तन्हाई में हथेली पर हमारा नाम क्यूं लिक्खा

8
एक तुम्हारे भोलेपन से,एक तुम्हारी पायल से
जब भी पाला पड़ता है,हम होते हैं कायल से
गांव की पगडण्डी पर लेकर गगरी जब भी चलती हो
देखके नक्शा अंगड़ाई का,हो जाते हैं घायल से

9
समझ कोई नहीं पाया हमारी प्रीत की भाषा
समझ तुम भी न पाओगे,हमारे गीत की भाषा
मुहब्बत को तिजारत मानने वालो जरा सुन लो
जमाने से सुनोगे कल,हमारी जीत की भाषा

10
कैसे कैसे मंजर साथी देखे हैं इन आंखों ने
सुख की तरस रही,लेकिन दुःख जीभर देखे आंखों ने
पल दो पल की खातिर कोई मन-आंगन में बैठ गया तो
तन्हा अगले पल ही हमको देखा है इन आंखों ने

11
मत कहना मुझको कि बादल आज शहर में फिर बरसा है
मत कहना मुझको प्रीतम का आज नहाकर दिल हरसा है
सुखी धरती तेज तपिश में, रोती-गाती रही महीनों
तुम्हीं बताओ धरती खातिर दिल बादल का कब तरसा है

12
दोस्ती काहे जताए जा रहे,कोई बात है ?
इसकी-उसकी क्यों बताए जा रहे,कोई बात है ?
कह दिया मुझको किसी से भी न कोई अब गिला,
ख्वामखा मुझको सताए जा रहे,कोई बात है ?

13
इस मौसम में सबको भाए,ऐसी कोई बात कहां
झुके हुए कंधों पर आए,ऐसा कोई हाथ कहां
बने बनाए सम्बन्धों में,मट्ठा डाल रहे हैं सब
टूटे चुके रिश्तों को जोड़े, ऐसा कोई साथ कहां

14
छोड़ अब चिन्ता फिकर,और काम धन्धा छोड़ दे
दोस्त बन और रात दिन चैटिंग से नाता जोड़ ले
पढ़ भी लोगे तो भला तुम कौन से बिड़ला बनोगे
फ्रैण्ड रिक्वेस्ट भेज कर जीवन-डगर को मोड़ ले

15
जिए ख्वाबों में हंसकर तो कभी ख्वाबों में हम रोये
नहीं मालूम कैसे बीज पिछले जन्म में बोये
अधूरा रह गया अपना हमेशा प्यार का किस्सा
तन्हा बैठ कर हमने खुद अपने अश्क हैं धोये


16
तुम बिन साथी कैसे बताएं, रात कटे ना दिन बीते
तन्हा जीवन निकल रहा है, यादों के आंसू पीते
अम्बर जितना गम पसरा और सागर सी बेचैनी है
समझ गया हूँ ढाई अक्षर, हम हारे और तुम जीते


17
अजब इस देश का अपने हुआ ये हाल है यारों
सियासत ने तबीयत से किया बेहाल है यारों
जिसे मौका मिला, उसने दिया सबको दगा जमकर
हड़पकर माल वतन को कर दिया कंगाल है यारों

18
नमन करते हैं हम गुरुवर, पधारे आज इस आँगन
खिल उट्ठा ह्रदय सबका, खुशियों का झरे सावन
भक्तों के हो रखवाले, गरीबों के मसीहा तुम
मेरे मालिक रहे आबाद, तुम्हारे दो चरण पावन

19
नहीं कोई तमन्ना अब, बची तुमसे मोहब्बत की
नहीं ख्वाहिश रही कोयी, गैरों की इनायत की
कहा मुफलिस मुझे तुने, यही इनाम है काफी
प्रिये हाँ, देख ली ताक़त अमीरों की शराफत की

20
शहर से दूर चलकर अब,चलो ऐसा बनायें घर
जहाँ रंजिश किसी से भी,न हो और ना किसी का डर
खुले दिल से मिलें सबसे,बिताएं चैन का जीवन
उतारें कर्ज मिटटी का,होकर हम ख़ुशी से तर

21
घाट घाट पर जाकर पानी,हमने खूब पिया अब तक
गम, दुश्वारी और उदासी,जीवन खूब जिया अब तक
तेरे मिलन की आस में साथी,सांझ हो गयी जीवन की
जिसको मान सकूँ अपना वो मिला नहीं पिया अब तक

22
तड़पने क्यूँ लगा ये दिल,  साँसें कंपकंपाई क्यूँ
तुम्ही ने कुछ किया होगा, हवाएं तेज आई क्यूँ
अचानक कब महक आई, आकर छू गयी तन-मन
सिहर उट्ठा बदन मेरा, ये आँखें डबडबाई क्यूँ.

23
लगाना, तोड़ देना दिल, कहो कैसी इनायत है
कल मुझसे कहा क्यूँ था, मोहब्बत ही इबादत है
जो चाहो फैसला कर लो, मगर सुन लो हमारी भी
है मुजरिम भी तुम्हारा औ तुम्हारी ही अदालत है

२४.
जीवन के तन्हा पथ पर,हार गए चलते चलते
साथी तुम जो साथ निभाते,चल लेते हंसते हंसते
मंजिल तक चलने की कस्में,खाकर हमको छोड़ गए
ये जीना भी क्या जीना है,जब जीएं जलते-जलते

२५
नाम रेत पर लिखकर उसने क्या क्या कसमें खाई थीं
पिछले सावन नाम की मेरे मेंहदी उसने रचाई थी
साथ निभाने वाली थी जो जीवन भर इस आंगन में
तोड़ गयी सब ख्वाब हमारे,रात जो ख्वाब में आई थी


मुक्तक


उल्फत के वो नजराने,तुम्हारे पास ही अच्छे
तिजारत के सभी माने,तुम्हारे पास ही अच्छे
नयी खुशियां,नया जीवन,मुबारक हो नयी शोहरत
हमारे पास नहीं कुछ तो,हमारे ख्वाब ही अच्छे
कुंवर प्रीतम



मुक्तक


क्या एहसान किया है तुमने,नयी हवेली में जाकर
जख्मी सांसें लेकर मुझको क्या करना मिलने आकर
साथ निभाने की सब कसमें,पगडण्डी पर छोड़ गयी
साथी दोष नहीं है तेरा,समझ गया हूं ढाई आखऱ
कुंवर प्रीतम 

मुक्तक


कभी फागन,कभी सावन,मुझे हर रूत सताती है
मिलन मावस औ पूनम का,न होता,मां बताती है
शनिचर ले रहा अंगड़ाइयां मेरे मुकद्दर में
कुंवर को आसमानी चाहतें अक्सर सताती हैं
कुंवर प्रीतम


मुक्तक


सितम की वादियों में गुल नया हमको खिलाना है
चमन को आज माली से खुद हमको बचाना है
नुमाइंदे बने दुश्मन हमारी कौम के, यारो 
हरेक आघात का प्रतिघात अब करके दिखाना है
कुंवर प्रीतम


मुक्तक


एक तुम्हारे भोलेपन से,एक तुम्हारी पायल से
जब भी पाला पड़ता है,हम होते हैं कायल से
गांव की पगडण्डी पर लेकर गगरी जब भी चलती हो
देखके नक्शा अंगड़ाई का,हो जाते हैं घायल से
कुंवर प्रीतम


कब तक आखिर गम खाएं और घूंट पिएं लाचारी के


दिल्ली में सुख-चैन से बैठे,नेताओं की नींद हराम
अब धक्के की एक जरूरत,होना तय है काम तमाम
आज वतन के पहरेदारों का जग देख रहा अभियान
अन्ना के संग मिलकर तोड़ें दिल्ली का झूठा अभिमान
जनता की ताकत तो देखो, नहीं यहां हम डरने वाले
सदा व्योम का द्वार खुला है पंख खोज ले उड़ने वाले
आज हमारी आशाओं का उज्जवल दीप बने अन्ना
भष्ट्राचार से मुक्त देश हो,जन-जन की है यही तमन्ना
कब तक आखिर गम खाएं और घूंट पिएं लाचारी के
अब उपचार करेंगे मिलकर,हम सारी बीमारी के
कुंवर प्रीतम

मुक्तक


समझ कोई नहीं पाया हमारी प्रीत की भाषा
समझ तुम भी न पाओगे,हमारे गीत की भाषा
मुहब्बत को तिजारत मानने वालो जरा सुन लो
जमाने से सुनोगे कल,हमारी जीत की भाषा
कुंवर प्रीतम


मुक्तक


हमें देखकर जो खिलती थीं, उन आंखों में नीर क्यूं
अमृत-पान कराया जिसने, उस छाती में पीर क्यूं
भूल गए जो खुद का जीना, अपने बच्चों की खातिर
उनके अरमानों पर प्रीतम, संतानों का तीर क्यूं
कुंवर प्रीतम

मुक्तक


पिता के पास था लेकिन,गया क्यूं दूर अब समझा
उड़ानें उसको भरनी थीं,पिता मजदूर था समझा
पराई भूमि पर दिन चार क्या बीते,गजब बदला
मगर बेनूर मां की आंख का दस्तूर ना समझा
कुंवर प्रीतम


इटली लौट गयीं सोनिया तो, कांग्रेस का काम तमाम


वो भी रात की बात थी, ये भी रात की बात है
तब बाबा की बात थी, अब अन्ना की बात है
डंडे के बल पर शासन ने रामदेव को भगा दिया था
जनता के बल पर अन्ना ने शासन को अब जगा दिया है
खिसियायी दिल्ली पछताए, अन्ना को अब भेज तिहाड़
दुबक-सुबक रहे कांग्रेसी, सुन जनता की जोर दहाड़
मनीष तिवारी और कपिल ने, कल तक फैलायी भ्रान्ति
देशहितैषी अन्ना की अब जोर चल रही जन-क्रान्ति
मनमोहन के नैन,नाक और कान नहीं अब करते काम
इटली लौट गयीं सोनिया तो, कांग्रेस का काम तमाम
कुंवर प्रीतम

आज मगर क्यूं पांव तुम्हारे,धरती पर ना धरते बोलो



दुनियादारी, झूठ फरेबी, हमसे क्यूं करते बोलो
हममें ही यह सब होता तो,भूखे क्यों मरते बोलो
तुम तो बैठ गए मंदिर में,क्या कहने श्री विग्रह के
सवामणि की मौज तुम्हारी,हम रोटी पे मरते बोलो
हम दुखियन के घर-आंगन में,दुख दुश्वारी पसरी और
सेठों के भागोत बंचाकर,सब बीमारी हरते बोलो
वनवासी प्रभु राम भए,औ सन्त विराजे जंगल में
सेठों के एसी कमरे में,क्यों चौमासे करते बोलो
गोमाता के पोषक होकर,कहां खो गए कृष्ण कन्हैया
भूखी मरतीं गोमाताएं,नेता चारा चरते बोलो
बेर कभी खाए सबरी के,और सुदामा के मन भाए
आज मगर क्यूं पांव तुम्हारे,धरती पर ना धरते बोलो
कुंवर प्रीतम

आधुनिक भारत का अन्ना नया महात्मा गांधी है


अन्ना तुमको नमन कोटिशः, लौहपुरुष सा जोश है
सत्ता के वहशी लोगों का तुमने उड़ाया होश है
जन लोकपाल के इक नारे पर देश तुम्हारे साथ खड़ा
भ्रष्टाचारी सत्ताधारी सबके मुंह पर मौन पड़ा
जोर-जुल्म,झूठे इल्जामों की न बनेगी बात यहां
पूरा देश खड़ा आज है, अन्ना तेरे साथ यहां
कल के छोरे मनीष तिवारी, की बोली भी सबने सुनी
जन-जन के अभियान पे कांग्रेस,भौंक रही है जली-भुनी
बनी बनायी पगडंडी पर चलने वाले थम जाएंगे
अन्ना की है राह नयी,अब साथ तुम्हारे सब आएंगे
गांधीवादी अन्ना के जन अभियान की आंधी है
आधुनिक भारत का अन्ना नया महात्मा गांधी है
कुंवर प्रीतम

आधुनिक भारत में अन्ना नया महात्मा गांधी है


अन्ना तुमको नमन कोटिशः, लौहपुरुष सा जोश है
सत्ता के वहशी लोगों का तुमने उड़ाया होश है
जन लोकपाल के इक नारे पर देश तुम्हारे साथ खड़ा
भ्रष्टाचारी सत्ताधारी सबके मुंह पर मौन पड़ा
जोर-जुल्म,झूठे इल्जामों की न बनेगी बात यहां
पूरा देश खड़ा आज है, अन्ना तेरे साथ यहां
कल के छोरे मनीष तिवारी, की बोली भी सबने सुनी
जन-जन के अभियान पे कांग्रेस,भौंक रही है जली-भुनी
बनी बनायी पगडंडी पर चलने वाले थम जाएंगे
अन्ना की है राह नयी,अब साथ तुम्हारे सब आएंगे
गांधीवादी अन्ना के जन अभियान की आंधी है
आधुनिक भारत का अन्ना नया महात्मा गांधी है
कुंवर प्रीतम

चूरु जिले का मान बढ़ाता आया है राजलेदसर

राजाणा की जिस धरती ने,पुरखों का था किया वरण
उस धरती को शीश नवाऊं,पकड़ूं बारम्बार चरण
किस विध करूं बखान,ये धरती कितनी पावनदायी है
जन्म मिला इस धरती पर,यह सबकी जीवनदायी है
गाथा इसकी अजर-अमर,इतिहास लिखा सम्मान का
कण-कण संघर्षों से भरा और साक्षी स्वाभिमान का
धर्म-चेतना और अध्यात्म की ज्योत यहां जलती आयी
तेरापंथ ने इसी धरा पर प्रज्ञा की किरणें पायी
इसी धरा पर आचार्यों ने,चौमासे हैं कई किए
युवाचार्य बने महाप्रज्ञ,और मोछब भी कई हुए
महाश्रमण ने आचार्यत्व में पहला मोछब यहीं किया
बात रखी अपने गुरुवर की,सबने ज्ञान-अमृत पिया
दूर-दिशावर गए कभी जो,रोजगार के वास्ते
विकसित होने के दिए,इस धरती ने रास्ते
कलकत्ता,दिल्ली,मुंबई और सेठ बसे जो अमदाबाद
इसी धरा के पुण्य प्रताप से है सबका घर आज आबाद
ऋणी सदा इस धरती के हम,एक प्रार्थना यही करें
जन्मभूमि की खातिर हम भी,काम बड़ा कुछ यहां करें
चूरु जिले का मान बढ़ाता आया है राजलेदसर
इसकी मिट्टी की खुशबू के आगे फीका है केसर
आओ भाई, सारे जागो,जन्म भूमि का करें वन्दन
काम बड़ा मिल करें,लगाएं इसके मस्तक पर चन्दन
कुंवर प्रीतम

यार मुसद्दी लाले का अब बेटा भी अखबारी है

यार मुसद्दी लाले का अब बेटा भी अखबारी है
छोटे-मोटे छुटभैय्ये सब उसके अब दरबारी हैं
तेल, नमक, साबुन, आटे की कल तक तौलातौली थी
खबरें लेता अब इन सबकी, सब उसके आभारी हैं
काम कलम का पकड़ लिया, पर लिखापढ़ी में मैट्रिक फेल
सड़क नापता था कल तक,अब खबरों पर उपहारी हैं
मोदी का धंधा पुश्तैनी, मंदा-मंदा चलता था
अब खबरों के बल पर जेबें रहती हरदम भारी हैं
मुखिया, नेता, कोतवाल सब, डरते उसकी खबरों से
दो नंबरी ठेकेदारों सी चमकी दुक्कनदारी है
प्रातः दर्शन अगर हुए, तो बकरा बनना तय मानो
जेब भराई नहीं हुयी तो लिख देगा गद्दारी है
ऐरे-गैरे नत्थू खैरे,इन सबका मौसेरा वो
लाला खबरीलाल बना पूरा इंडियन जरदारी है
अपने खबरीलाल का यारों,ये तो था बस ट्रेलर भर
मीडिया में ऐसे लोगों की जगह-जगह भरमारी है
कुंवर प्रीतम

कैसा है अब गांव का मंजर,चैटिंग में ही समझा दो


नहीं डाकिया अब आता है, फेसबुकी साथी बतला दो
कैसा है अब गांव का मंजर,चैटिंग में ही समझा दो

पनघट पर अब लय में सुरीली,पायल बजती है कि नहीं
और परब पे तीखी आंखें,काजल से सजती हैं कि नहीं

धूल,धूएं-धक्कड़ वाली,गलियों का आलम कैसा है
जिस कमसिन पे जान फिदा थी,उसका बालम कैसा है

क्या अब भी गांव की गोशाला में, गोधन पाले जाते हैं
और टुन-टुन घंटी वाली बकरी, लेकर ग्वाले आते हैं

क्या चैत सुदी पूनम का मेला अब भी वैसा भरता है
मंदिर की चौखट पर सूरज,क्या पहली किरणें धरता है

फागुन के गींदड़ में अब भी, केसरिया मेह बरसता है
आंगन-आंगन अब भी वहां,रिश्ते का नेह बरसता है

पीपल की छांव तले अब भी क्या चलती है चौपाल वहां
और दरोगा से बढ़कर, मुखिया अब भी कोतवाल वहां

तांगे की जगह ऑटो वालों को मिलती है सवारी रोज बता
जो अपने दौर में होती थी, क्या अब भी है वो मौज बता

नौबजिया खटखट बस अब भी, बेटैम वहां पर आती है
मोटियार गए जो दूर कहीं, खत उनके अभी भी लाती है

संस्कृत वाले माटस्साब, तुतलाकर पाठ पढ़ाते थे
हम बोपदेव जैसे छोरों को, विद्या जो रटंत रटाते थे

रामभुवन हलवाई के पेडे़-लड्डू का हाल बता
ईंटों वाली सैलून के नाई का सारा हाल बता

हम किस्मत के मारे बन्धु,गांव छोड़कर आ गए
दो पैसे की खातिर खुद ही अपनी संस्कृति खा गए

तब बीघों में रहते थे,अब स्क्वायर फुट की मजबूरी
तब एक आंगन में पलते थे,अब किलोमीटर की दूरी

वहां रामा-सामी चलती थी,यहां दाम-दाम की माला है
विश्वास नहीं भाई-भाई का,हर धंधा गड़बड़झाला है

काम चले या कि न चले, पर रहते हरदम व्यस्त यहां
ये शहर फरेब की धरती है,कर्जे में सारे पस्त यहां

कुंवर प्रीतम
10 अगस्त 2011

सागर सी बेचैनी ले अब,गांव भला क्या जाऊं


किस पर गीत बनाऊं साथी, किससे प्रीत निभाऊं
बिछुड़ गए सब संगी साथी,किसको गीत सुनाऊं
धक्कड़-धूल,धूएं में पसरा,अम्बर तक फैला जीवन
सागर सी बेचैनी ले अब,गांव भला क्या जाऊं

कुंवर प्रीतम

कैसे कैसे मंजर साथी देखे हैं इन आंखों ने


कैसे कैसे मंजर साथी देखे हैं इन आंखों ने
सुख की तरस रही,लेकिन दुःख जीभर देखे आंखों ने
पल दो पल की खातिर कोई मन-आंगन में बैठ गया तो
तन्हा अगले पल ही हमको देखा है इन आंखों ने
कुंवर प्रीतम

तुम्हीं बताओ धरती खातिर दिल बादल का कब तरसा है


मत कहना मुझको कि बादल आज शहर में फिर बरसा है
मत कहना मुझको प्रीतम का आज नहाकर दिल हरसा है
सुखी धरती तेज तपिश में, रोती-गाती रही महीनों
तुम्हीं बताओ धरती खातिर दिल बादल का कब तरसा है
कुंवर प्रीतम

ख्वामखा मुझको सताए जा रहे,कोई बात है ?


दोस्ती काहे जताए जा रहे,कोई बात है ?
इसकी-उसकी क्यों बताए जा रहे,कोई बात है ?
कह दिया मुझको किसी से भी न कोई अब गिला,
ख्वामखा मुझको सताए जा रहे,कोई बात है ?
कुंवर प्रीतम

फूल तक मुरझा गए उसके बगान में


कालीन जो बिछ गए उसके मकान में
फर्क कहां रह गया घर-दुकान में

शोहरत से जोड़ने लगा हर शै को यार वो
फूल तक मुरझा गए उसके बगान में

होता जो खानदानी तो मिजाज रखता नर्म
बू अना की आ रही, इस नादान में

पुरखों ने तंगहाली में मजबूत रक्खे पांव
वो मगर उड़ न जाए कल तूफान में

परिन्दा तक न छत पे बैठेगा छांव को
मिट्ठू क्यों बन रहा है अपनी जान में

कुंवर प्रीतम

कल सूरज की किरणों का भी बिल आएगा भाई रे


महंगाई ने कहर ढा दिया, जान बचाओ भाई रे
कल सूरज की किरणों का भी, बिल आएगा भाई रे

बाबू जी हैं शहर गए और मां बैठी इन्तजारी में
डाकिया बाबू अब मनियाडर, कब लाएगा भाई रे

शहर के बच्चे खेल रहे हैं गेम वीडियो और फेसबुक
मजदूर-किसान का बेटा पढ़ने, कब जाएगा भाई रे

पौबारह पच्चीस हुए सब दिल्ली वाले नेतवन के
गांव हमारा बिजली-पानी, कब पाएगा भाई रे

उनकी डाटर लिखी-पढ़ी थी,शहर भागकर चली गयी
दुखिया आंगन अपनी बिटिया,कब ब्याहेगा भाई रे

मलकीनिया के तेवर देखे,मॉल गयी है बनी-ठनी
गांव-मोहल्ले गीत खुशी के कब गाएगा भाई रे

बाबू के घर गैस सिलेंडर,गाड़ी,फ्रीज,टेलीविजन
बेर हमारा जूठा रघुवर,कब खाएगा भाई रे

कुंवर प्रीतम

कुंवर प्रीतम के मुक्तक


इस मौसम में सबको भाए,ऐसी कोई बात कहां
झुके हुए कंधों पर आए,ऐसा कोई हाथ कहां
बने बनाए सम्बन्धों में,मट्ठा डाल रहे हैं सब
टूटे चुके रिश्तों को जोड़े, ऐसा कोई साथ कहां
कुंवर प्रीतम

जो दिल में बसा है वो दोस्त क्या, भगवान होता है


सुबह से मोबाइल पर लगातार संदेश आ रहे हैं
सारे शहरी,पढ़े-लिखे लोग दोस्ती जता रहे हैं
ईमेल और फेसबुक पर तो गजब की है हालत
दोस्ताने के इजहार की सबको पड़ रही जरूरत
सलामत रहे दोस्ताना हमारा जैसे संकल्प लिए जा रहे हैं
और हम भी सेम टू यू लिखकर दोस्ती निभा रहे हैं
सुबह से शामतलक, धूंआधार चल रहा है यह क्रम
पर मतलबी और सच्चे दोस्त का बना हुआ है भ्रम
पर बचपन के उस मित्र ने नहीं मनाया दोस्ती का त्योहार
मोबाइल, ईमेल या फेसबुक-कहीं नही था वो यार
बचपन का वो मित्र,खेती करता है अपने गांव
वो जानता है, दोस्ती नहीं है दिखावे का दांव
बगैर एसएमएस के, दोस्ती का दिला दिया विश्वास
हां बटेश्वर, तुम्हारी दोस्ती से बड़ा नहीं है आकाश
मित्रों, सच्ची दोस्ती का भी कोई इम्तिहान होता है
जो दिल में बसा है वो दोस्त क्या, भगवान होता है

कुंवर प्रीतम

उम्मीद का सूरज - मां

मुफलिसी का मारा
जिन्दगी का सफर
होता है मुकाबिल जब
गर्दिशों की धूप से
तब सांसे भी
लगने लगती हैं बोझिल।
हताशा का घटाटोप जब
पराक्रम की किरणों पर
ग्रहण लगा देता है,तब
उम्मीद का सूरज बनकर
आती है मां,देती है ऊर्जा।
ढ़लती है रात
हताशा की
और
पुनर्जीवित हो उठता हूं मैं। 
हसरतों के बोशीदा लिबास में लिपटी 
अनपढ़, गांव में पली
धुल-धक्कड़ और धुवें से वास्ता रखने वाली माँ, 
जो न रुपयों का मोल जानती है और
न हिसाब रख पाती है किसी चीज का
जाने कहां से जुटाती है हिम्मत
और बेगरज,बेलौस
पहनाती है मुझे
साहस का ऐसा पैरहन
जो
रक्षाकवच बनकर
देता है जीवन को
शाश्वत सुरक्षा.

कुंवर प्रीतम

कल के छोरे राहुल गांधी को कमान अब देनी है


कांग्रेस का हाल न पूछो,यह पार्टी पुश्तैनी है
मैडम सोनिया के ऑपरेशन,पर चारो ओर बेचैनी है
तपे-तपाए, मंझे-मंझाए नेताओं की पूछ कहां
कल के छोरे राहुल गांधी को कमान अब देनी है
मैडम के बेटे की खिदमत,में न कमी कोई आए
ठकुरसुहाती दिग्गी राजा, रात-दिवस करता जाए
एक अकेला नहीं है दिग्गी,यहां है पूरी फौज खड़ी
दोयम दर्जे के नेताओं से,कांग्रेस हैं भरी पड़ी।
कुंवर प्रीतम

अरमानों का टकराव


अंतस में उफनते
अरमानों का टकराव
हर रोज होता है
हालात से
और कुरुक्षेत्र बना
हृदयस्थल फिर
ढूंढने लगता है
उसी कृष्ण को
जिसने दिया था संदेश
कर्मण्येवाधिकारस्ते का।
गीता में कहे बोल
गूंजने लगते हैं
प्रेरणा बनकर
देते हैं पाथेय
और समा जाते हैं
शनैः शनैः
हृदय में
फिर दस्तक देते हैं
आत्मा के आंगन में
अंततोगत्वा
उफनते अरमानों का टकराव
पा जाता है समाधान
और निकल पड़ता है
कर्म की पगडंडी पर।
कुंवर प्रीतम

संसद भी अपनी बनी फकत,हाट,मॉल बाजार है


संसद भी अपनी बनी फकत,हाट,मॉल बाजार है

सौगन्ध महात्मा गांधी की खाकर ये कलम उठाता हूं
है साठ साल में क्या गुजरी,ये हाल सभी को सुनाता हूं
जुल्मी गोरों से हुए मुकाबिल,भारत मां को आजाद किया
सोने की चिड़िया है भारत,सारे जग में शंखनाद किया
आजाद वतन अपना है,अब अपनी धरती-अपनी भाषा
कितने सपने देखे सबने,थी खिली-खिली सबकी आशा
पर आज कलम रोते रोते है विवश हुयी सच कहने को
दुःख साठ साल तक बहुत सहा,अब और बचा क्या सहने को
चीख रहा भारत कुटिया में,नेताओं की मस्ती है
उनके हैं महंगे लाख जतन,पर जान हमारी सस्ती है
हर सांस यहां अब घुटन भरी,चौका-चूल्हा लाचारी में
गांव-गरीब-मजदूर-किसान,हैं सबके सब बीमारी में
जिन खेतों की धरा कभी,उगला करतीं हीरे-मोती
उन खेतों में भारत मां अब बेबस और भूखी सोती
दिल्ली को फिक्र कहां प्रीतम, उसके तो गोरखधंन्धे हैं
देख रहे मंजर सारा,पर बनते आंखे से अन्धे हैं
ईमान बेचने वाले अब संसद में लाए जाते हैं
जेलों में जिनकी जगह बनी,संसद में पाए जाते हैं
घोटालों का कुम्भ यहां अब बारहमासी त्योहार है
संसद भी अपनी बनी फकत,हाट,मॉल बाजार है
कुंवर प्रीतम

मत मांग भीख रोटी खातिर,उठ आज अभी बागी बन जा


मत मांग भीख रोटी खातिर,उठ आज अभी बागी बन जा

मत मांग भीख रोटी खातिर,उठ आज अभी बागी बन जा
पुरजोर बगावत दिल्ली से करनी है, चल बागी बन जा
लिए कटोरा भीख मांगते,साठ साल हैं बीत गए
भारत हार गया अपना पर सारे दागी जीत गए
घोटालों का कुम्भ यहां बारहमासी त्योहार है
कुर्सी वाले मस्ती में और सारा भारत लाचार है
भूखे नंगे बच्चों को क्यूं, मिली न रोटी आज तलक
आ,बागी बनकर आज सिखाएं, नेताओं को कड़ा सबक
स्कूली बच्चों का भोजन भी नेताजी गटक रहे
आजाद कराने वाले दर-दर पेंशन खातिर भटक रहे
बची कहां है मां-बहनों की इज्जत अपने देश में
बापू,लो अवतार आज फिर लाठी वाले वेश में
कुंवर प्रीतम

फेसबुकी संसार में यारो, बनते मीत हजार हैं


फेसबुकी संसार में यारो, बनते मीत हजार हैं
परिचित,भूले-बिसरे मित्रों का ये गजब संसार है
लेकिन बात हकीकत की इक, पूछ रहा है दोस्त कुंवर
कितने साथ निभाएंगे, जब फंसेगा कोई बीच भंवर
कलियुग का है दौर, यहां पर रिश्ता कौन निभाता है
मतलब का है नेह यहां और मतलब का ही नाता है
प्रेम की भाषा लिखने वाले,फेसबुकियों की चाल में
नामसझी में हलो किया तो समझो फंस गए जाल में
हालांकि सब नहीं है फर्जी, फिर भी सुन लो सीख मेरी
सावधान गर नहीं रहे तो,कल निकलेगी चीख तेरी
कुंवर प्रीतम

अरे निकम्मो, देश लुटेरो,बापू को कुछ याद करो



अन्ना की तमन्ना है कि मिट जाए सब भ्रष्टाचार
मगर सियासतदां सब के सब अपनी आदत से लाचार
कैसे-कैसे दम्भी बैठे कांग्रेस में आज हैं
दमन कर रहे जन आकांक्षा, नहीं किसी को लाज है
एक पीएम से आस बची थी, वह भी निकले अ-सरदार
सारे नेता बने हुए हैं चमचों के परचमबरदार
अरे निकम्मो, देश लुटेरो,बापू को कुछ याद करो
देश हमारा सबसे ऊपर, मत इसको बरबाद करो
कुंवर प्रीतम



अपनी सड़क बपौती है पर, वहां शरम हमको आई


सात समंदर पार गए, पर नशा पान का सौ फीसद
बीते 15 दिन थे अपने पूरे के पूरे त्रासद
शौक पान का रखता हूं और ऊपर से जर्दे का साथ
नहीं साथ ले जा पाया, तो रखा रजनीगंधे पे हाथ
कहा किसी से नहीं जो अब तक, बात बताता हूं स्पष्ट
खूब चबाए पान-मसाले, थू-थू का था पूरा कष्ट
चमकीली सड़कों पर कैसे थूक गिराते हम भाई
अपनी सड़क बपौती है पर, वहां शरम हमको आई
किया नशा और निगली पीक, 15 दिन तक यही चला
मजबूरी के मारे थे हम, विकल्प कहां था और भला
वतन लौट कर खुद पर सोचा, हम कितने खुदगर्जी हैं
अपनी मां पर थूक रहे पर, वहां न चलती मर्जी है
शायद कभी सुधर जाएं हम, माफ करो भारत माता
हीरा मोती तुम्हीं उगलती,तुमसे मां घर का नाता।
कुंवर प्रीतम

ठोकर मारी कुण्डली को और, हम यूरोप चले आए-1

ठोकर मारी कुण्डली को और, हम यूरोप चले आए
भर पखवाड़े घूमे जितने, देश यहां सारे भाए
सुबह शहर काली का छोड़ा, पहुंच गए दुबई दोपहर
भरी उड़ान वहां से सीधी, ज्यूरिक पहुंचे रात पहर
लेकिन वक्त वहां था पीछे,बजे थे केवल साढ़े आठ
अपने देश में जनता लेकिन, पकड़ चुकी थी कबकी खाट
आर्द्धरात्रि भारत में थी पर, वहां का सूरज चढ़ा हुआ था
रात वहां थोड़ी होती है, यह पुस्तक में पढा हुआ था
निकले एअरपोर्ट छोड़कर, पहुंचे हम होटल हिल्टन 
मौसम था मीठा-मीठा, और खिला-खिला था सबका मन
बीतेगा एक दिन मस्ती में, घूमेंगे हम शहर यहां
ज्यूरिक कहता है हम सबसे, देखो पर्वत,नहर यहां
पहले दिन ज्यूरिक में घूम, हमने पूरा प्रवास किया
कम आबादी, साफ-सूथरी सड़कों का आभास किया
बार-बार मन पूछ रहा था, क्यों भारत तंगहाल है
संस्कार-संस्कृति में अव्वल, फिर भी हम बदहाल हैं
उत्तर सहज मिला हमको कि दोषी है बढ़ती आबादी
खुदगर्जी में डूबे हैं हम, इसीलिए होती बर्बादी
यहां और एक बात खास थी, नीट एंड क्लीन था रास्ता
साफ सूथरी ट्राम,बसों से भी था अपना पड़ा वास्ता
सब कुछ भाया मन को लेकिन, एक लगा हमको खटका
बीच सड़क पे खड़ा युगल, क्यूं करता हर पल चुम्मा-चटका
बात गले बस यही न उतरी, और न कोई बात थी
हम ब्रह्मचारी बने हुए थे,पत्नी कहीं न साथ थी
कुंवर प्रीतम






महंगाई के दौर में चूल्हा, रोता सुबह-ओ-शाम है


यूपीए का राज गजब है,लाचारी चहुंओर है
पी.एम एक भला है तो क्या,आधी कैबिनेट चोर है
मूर्छित पीएम सोच रहे हैं, ऐसी क्यूं किस्मत फूटी
जिसने पलकों पर बैठाया, जनता आज वही रूठी
सच्चाई और नेक इरादे था जिस पार्टी का नारा
आज उसी पार्टी का पीएम,है शागिर्दों से हारा
दाल में काला वाली बातें, अब न होती चरितार्थ हैं
अब काले में दाल पड़ी है, नेताओं का स्वार्थ है
गीता और रामायण के सब ज्ञान बहाए गंगे में
देशप्रेम-सौहार्द्र मिटाए, हिन्दु-मुसलिम दंगे में
राहुल बाबा गांव गली में स्वांग रचाकर घूम रहे हैं
दलितों के घर-घर जाकर, आंगन उनका चूम रहे हैं
महंगाई के दौर में चूल्हा, रोता सुबह-ओ-शाम है
दे पाया है कौन किसी को, सबके दाता राम हैं
कुंवर प्रीतम

वही अब ढूंढते है अपनी दाढ़ी में फंसा तिनका


  • जरा सोचो, हमारे नेकदिल पीएम पे क्या गुजरी
  • करी मन्नत सुबह-ओ-शाम, मगर हालत नहीं सुधरी
  • बचाने के लिए सरकार, क्या-क्या गुल खिलाते हैं
  • कभी गुरुद्वारे जाते थे, अब जनपथ पे जाते हैं
  • सदा ईमानदारी से कटा जीवन सहज जिनका
  • वही अब ढूंढते है अपनी दाढ़ी में फंसा तिनका
  • कुंवर प्रीतम

बन्द करो घोटाले जल्दी, यही देश की मांग है


सोहेल हिन्दुस्तानी और ए.राजा बैठे जेल में
ये नगदी के खेल में वो 2 जी के खेल में
दोनों ने मुंह खोल दिया है,फंसने वाले हैं मनमोहन
राजा-सोहेल दोनों बोलें,उनका हो रहा दोहन
उधर अमर सिंह अगर फंसे तो गिरनी तय सरकार है
सेटलमेंट करें कांग्रेसी,पड़ी सियासी मार है
मौका देख मुलायम कूदे,कहे अमर का दोष नहीं है
घोटाले में फंसी यूपीए, यहां किसी को होश नहीं है
उधर,तिहाड़ से कहा किसी ने, कलमाड़ी बीमार है
भूल रहा सब, माल हड़पकर, जेहन से लाचार है
कहे कुंवर कविराय,कूंए में पड़ी चतुर्दिक भांग है
बन्द करो घोटाले जल्दी, यही देश की मांग है
कुंवर प्रीतम

Prakash Chandalia in Netherland (Holland) May-2011. IS THIS HIS NEW FAMILY THERE? KHAMOSH..............grrrrrrrrrrrr.

Prakash Chandalia smiles during a function at Kolkata on 23 July 2011

Switzerland ke ek tourist spot se Boating ka anand lete huve Prakash Chandalia. Sitting beside him is Sri Pradeep Todi , kolkata

Prakash Chandalia at Jungfrau, Switzerland.(10,333 ft) May 2011

Prakash Chandalia with friends at Zurich, Switzerland. 19 May 2011

Prakash Chandalia at Geneva. May-2011

Prakash Chandalia outside Paris Museum. May-2011

Prakash Chandalia with friends in front of UBS (Swiss Bank), Zurich, Switzerland. 19 May 2011