हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रोफ़ेसर कल्याण मल लोढ़ा नहीं रहे

प्रकाश चंडालिया

हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार व जोधपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफ़ेसर कल्याण मल लोढ़ा का २१ नवम्बर की रात लगभग २।३० बजे जयपुर में निधन हो गया. वे ८९ वर्ष के थे. प्रोफ़ेसर लोढ़ा पिछले कुछ वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे. २९ सितम्बर १९२१ को राजस्थान में जन्मे प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने १९४३ में इलाहबाद विश्वविद्यालय, प्रयाग से हिंदी में एम ए किया. सन १९४५ में आप पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता आकर बस गए. कलकत्ता के जयपुरिया कॉलेज में आप हिंदी के विभाध्यक्ष नियुक्त हुए. १९४८ में कलकत्ता विश्वविद्यालय में अंशकालिक प्राध्यापक के रूप में काम शुरू किया, फिर १९५३ में पूर्णकालिक प्राध्यापक नियुक्त हुए. १९६० में आप रीडर बने और १९७४ में प्रोफ़ेसर. १९६० से ८० तक आप कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे. इस लम्बे कार्यकाल में आपने हिंदी की विकास यात्रा में नए आयाम स्थापित किये. हिंदी के सुविख्यात विद्वान तथा उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल आचार्य विष्णुकांत शास्त्री कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर लोढ़ा के शिष्य रहे. सन १९७९ से ८० तक आप राजस्थान के जोधपुर विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त किये गए. एक वर्ष के पश्चात आप पुनः कलकत्ता आ गए फिर सन १९८६ में आपने कलकत्ता विश्वविद्याला से अवकाश ग्रहण किया. प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने ५० से अधिक शोध निबंध लिखे. आपने दर्जनों पुस्तकों की रचना की, जिनमे प्रमुख हैं- वाग्मिता, वाग्पथ, इतस्ततः, प्रसाद- सृष्टी व दृष्टी , वागविभा, वाग्द्वार, वाक्सिद्धि, वाकतत्व आदि. इनमे वाक्द्वार वह पुस्तक है, जिसमे हिंदी के स्वनामधन्य आठ साहित्यकारों - तुलसी, सूरदास, कबीर, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदानों का सुचिंतित तरीके से मूल्याङ्कन किया गया है. प्रोफ़ेसर लोढ़ा ने प्रज्ञा चक्षु सूरदास , बालमुकुन्द गुप्त-पुनर्मूल्यांकन, भक्ति तत्त्व, मैथिलीशरण गुप्त अभिनन्दन ग्रन्थ का संपादन भी किया. प्रोफ़ेसर लोढ़ा को उनके साहित्यिक अवदानों के लिए मूर्ति देवी पुरस्कार, केंद्रीय हिंदी संसथान-आगरा से राष्ट्रपति द्वारा सुब्रमण्यम सम्मान, अमेरिकन बायोग्राफिकल सोसाइटी अदि ने सम्मानित किया. आप अपनी ओजपूर्ण वाक्शैली के लिए देश भर जाने जाते थे. विविध सम्मेलनों में आपने अपना ओजश्वी वक्तव्य देकर हिंदी का मान बढाया. आप के के बिरला फाउन्डेसन, भारतीय विद्या भवन, भारतीय भाषा परिषद्, भारतीय संस्कृति संसद सरीखी देश की सुप्रसिद्ध संस्थावों से जुड़े हुए थे. प्रोफ़ेसर लोढ़ा के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है. उनका अंतिम संस्कार रविवार २२ नवम्बर को जयपुर में किया जा रहा है.

दिवाली का राम राम


विद्रोही रचनाशीलता के एक कवि श्री हरीश भादानी जी नहीं रहे़......

लेखक: शम्भु चौधरी, कोलकाता



Harish Bhadaniकोलकाता:(दिनांक 2 अक्टूबर 2009): अभी-अभी समाचार मिला है कि राजस्थान के 'बच्चन' कहे जाने वाले प्रख्यात जनकवि हरीश भादानी का आज तड़के चार बजे बीकानेर स्थित आवास पर निधन हो गया। वे 76 वर्ष के थे। हरीश भादानी अपने पीछे तीन पुत्रियां और एक पुत्र छोड़ गए हैं। वे पिछले कुछ दिनों से अस्‍वस्‍थ चल रहे थे। शुक्रवार को उनकी देह अंतिम दर्शन के लिए उनके आवास पर रखी जाएगी। शनिवार को उनकी इच्छा के अनुरूप अंतिम संस्कार के स्थान पर उनके पार्थिव शरीर को सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए सौंपा जाएगा। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे भादानी ने हिन्दी के साथ राजस्थानी भाषा को भी संवारने का कार्य किया। राजस्‍थान के वि‍गत चालीस सालों के प्रत्‍येक जन आंदोलन में उन्‍होंने सक्रि‍य रूप से हि‍स्‍सा लि‍या था। राजस्‍थानी और हिंदी में उनकी हजारों कवि‍ताएं हैं। ये कवि‍ताएं दो दर्जन से ज्‍यादा काव्‍य संकलनों में फैली हुई हैं। मजदूर और कि‍सानों के जीवन से लेकर प्रकृति‍ और वेदों की ऋचाओं पर आधारि‍त आधुनि‍क कवि‍ता की प्रगति‍शील धारा के नि‍र्माण में उनकी महत्‍वपूर्ण भूमि‍का थी। इसके अलावा हरीशजी ने राजस्‍थानी लोकगीतों की धुनों पर आधारि‍त उनके सैंकड़ों जनगीत लि‍खें हैं जो मजदूर आंदोलन का कंठहार बन चुके हैं।


आज जैसे ही राजस्थान से श्री सत्यनारायण सोनी जी का फोन मिला, मैं स्तब्ध रह गया। हाथों-हाथ मैंने श्री अरुण माहेश्वरी से बात की, तो उन्होंने बताया कि आज सुबह ही उनका शरीर शांत हो गया। पिछले सप्ताह ही श्री भादानी जी अपने नाती (अरुण जी के लड़के) के विवाह में शरीक होने के लिये कोलकाता आये थे। उस समय आप स्वस्थ्य से काफी कमजोर दिख रहे थे परन्तु नाती के विवाह की खुशी और सरला के प्रेम ने उसे कोलकाता खिंच लाया था। श्री अरुण जी ने बताया कि पिछले 26 सितम्बर को ही वे राजस्थान लोट गये थे।


श्री हरीश भादानी का जन्म 11 जून 1933 बीकानेर में (राजस्थान) में हुआ। आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादन भी किया। कोलकात्ता से प्रकाशित मार्कसवादी पत्रिका 'कलम' (त्रैमासिक) से भी आपका गहरा जुड़ाव रहा है। आपकी अनौपचारिक शिक्षा पर 20-25 पुस्तिकायें प्रकाशित हो चुकि है। आपको राजस्थान साहित्य अकादमी से "मीरा" प्रियदर्शिनी अकादमी", परिवार अकादमी, महाराष्ट्र, पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी(कोलकाता) से "राहुल" । के.के.बिड़ला फाउंडेशन से "बिहारी" सम्मान से सम्मानीत किया जा चुका है। इनके व्यक्तित्व ने बीकानेर नगर के होली के हुड़दंग में एक नई दिशा देने का प्रयास किया। खेड़ा की अश्लील गीतों के स्थान पर भादानीजी ने नगाड़े पर ग्रामीण वेशभूषा में सजकर समाज को बदलने वाले गीत गाने की परम्परा कायम की, उससे बीकानेर के समाज में बहुत अच्छा प्रभाव परिलक्षित हुआ था। उनका सरल और निश्चल व्यक्तित्व बीकानेर वासियों को बहुत पसन्द आता है। भादानीजी में अहंकार बिल्कुल नहीं है। इनके व्यक्तित्व में कोई छल छद्म या चतुराई नहीं है।

हरीश भादानी ने अपने परिवारिक जीवन में भी इसी प्रकार की जीवन दृष्टि रखी है और ऐसा लगता है कि उनको यह संस्कार अपने पिता श्री बेवा महाराज से प्राप्त हुए हैं। उनके गले का सुरीलापन भी उनके पिता की ही देन समझी जानी चाहिए। लेकिन उनके पिताश्री के सन्यास लेने से भादानीजी अपने बचपन से ही काफी असन्तुष्ट लगते हैं और इस आक्रोश और असंतोष के फलस्वरूप उनका कोमल हृदय गीतकार कवि बना। छबीली घाटी में उनका भी विशाल भवन था। वह सदैव भक्ति संगीत और हिंदी साहित्य के विद्वानों से अटा रहता था। हरीश भादानी प्रारंभ में रोमांटिक कवि हुआ करते थे। और उनकी कविताओं का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर एकसा पड़ता था। भादानी के प्रारंभिक जीवन में राजनीति का भी दखल रहा है। लेकिन ज्यों-ज्यों समय बीतता गया हरीश भादानीजी एक मूर्धन्य चिंतक और प्रसिद्ध कवि के रूप में प्रकट होते गए। हरीश भादानीजी को अभी तक एक उजली नजर की सुई 1967-68 एवं सन्नाटे के शिलाखण्ड पर 1983-84 पर सुधीन्द्र काव्य पुरस्कार राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार, द्वारा सुधीन्द्र पुरस्कार एक अकेला सूरज खेले पर मीरा पुरस्कार, पितृकल्प पर बिहारी सम्मान महाराष्ट्र, मुम्बई से ही प्रियदर्शन अकादमी से पुरस्कृत, राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर से विशिष्ठ साहित्यकार के रूप में सम्मानित किए जा चुके हैं।


11 जून 1933 बीकानेर में (राजस्थान) में आपका जन्म हुआ। आपकी प्रथमिक शिक्षा हिन्दी-महाजनी-संस्कृत घर में ही हुई। आपका जीवन संघर्षमय रहा । सड़क से जेल तक कि कई यात्राओं में आपको काफी उतार-चढ़ाव नजदीक से देखने को अवसर मिला । रायवादियों-समाजवादियों के बीच आपने सारा जीवन गुजार दिया। आपने कोलकाता में भी काफी समय गुजारा। आपकी पुत्री श्रीमती सरला माहेश्वरी ‘माकपा’ की तरफ से दो बार राज्यसभा की सांसद भी रह चुकी है। आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादक भी रहे । कोलकाता से प्रकाशित मार्क्सवादी पत्रिका ‘कलम’ (त्रैमासिक) से भी आपका गहरा जुड़ाव रहा है। आपकी प्रोढ़शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा पर 20-25 पुस्तिकायें राजस्थानी में। राजस्थानी भाषा को आठवीं सूची में शामिल करने के लिए आन्दोलन में सक्रिय सहभागिता। ‘सयुजा सखाया’ प्रकाशित। आपको राजस्थान साहित्य अकादमी से ‘मीरा’ प्रियदर्शिनी अकादमी, परिवार अकादमी(महाराष्ट्र), पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी(कोलकाता) से ‘राहुल’, । ‘एक उजली नजर की सुई(उदयपुर), ‘एक अकेला सूरज खेले’(उदयपुर), ‘विशिष्ठ साहित्यकार’(उदयपुर), ‘पितृकल्प’ के.के.बिड़ला फाउंडेशन से ‘बिहारी’ सम्मान से आपको सम्मानीत किया जा चुका है । आपके निधन के समाचार से राजस्थानी-हिन्दी साहित्य जगत को गहरा आघात शायद ही कोई इस महान व्यक्तित्व की जगह ले पाये। हम ई-हिन्दी साहित्य सभा की तरफ से अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं एवं उनकी आत्मा को शांति प्रदान हेतु ईश्वर से प्रथना करते हैं।

हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकें:




अधूरे गीत (हिन्दी-राजस्थानी) 1959 बीकानेर।
सपन की गली (हिन्दी गीत कविताएँ) 1961 कलकत्ता।
हँसिनी याद की (मुक्तक) सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर 1963।
एक उजली नजर की सुई (गीत) वातायान प्रकाशन, बीकानेर 1966 (दूसरा संस्करण-पंचशीलप्रकाशन, जयपुर)
सुलगते पिण्ड (कविताएं) वातायान प्रकाशन, बीकानेर 1966
नश्टो मोह (लम्बी कविता) धरती प्रकाशन बीकानेर 1981
सन्नाटे के शिलाखंड पर (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर1982।
एक अकेला सूरज खेले (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1983 (दूसरा संस्करण-कलासनप्रकाशन, बीकानेर 2005)
रोटी नाम सत है (जनगीत) कलम प्रकाशन, कलकत्ता 1982।
सड़कवासी राम (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1985।
आज की आंख का सिलसिला (कविताएं) कविता प्रकाशन,1985।
विस्मय के अंशी है (ईशोपनिषद व संस्कृत कविताओं का गीत रूपान्तर) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1988ं
साथ चलें हम (काव्यनाटक) गाड़ोदिया प्रकाशन, बीकानेर 1992।
पितृकल्प (लम्बी कविता) वैभव प्रकाशन, दिल्ली 1991 (दूसरा संस्करण-कलासन प्रकाशन, बीकानेर 2005)
सयुजा सखाया (ईशोपनिषद, असवामीय सूत्र, अथर्वद, वनदेवी खंड की कविताओं का गीत रूपान्तर मदनलाल साह एजूकेशन सोसायटी, कलकत्ता 1998।
मैं मेरा अष्टावक्र (लम्बी कविता) कलासान प्रकाशन बीकानेर 1999
क्यों करें प्रार्थना (कविताएं) कवि प्रकाशन, बीकानेर 2006
आड़ी तानें-सीधी तानें (चयनित गीत) कवि प्रकाशन बीकानेर 2006
अखिर जिज्ञासा (गद्य) भारत ग्रन्थ निकेतन, बीकानेर 2007

राजस्थानी में प्रकाशित पुस्तकें:


बाथां में भूगोळ (कविताएं) धरती प्रकाशन, बीकानेर 1984
खण-खण उकळलया हूणिया (होरठा) जोधपुर ज.ले.स।
खोल किवाड़ा हूणिया, सिरजण हारा हूणिया (होरठा) राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति जयपुर।
तीड़ोराव (नाटक) राजस्थानी भाषा-साहित्य संस्कृति अकादमी, बीकानेर पहला संस्करण 1990 दूसरा 1998।
जिण हाथां आ रेत रचीजै (कविताएं) अंशु प्रकाशन, बीकानेर।

इनकी चार कविताऎं:-


1.
बोलैनीं हेमाणी.....
जिण हाथां सूं
थें आ रेत रची है,
वां हाथां ई
म्हारै ऐड़ै उळझ्योड़ै उजाड़ में
कीं तो बीज देंवती!
थकी न थाकै
मांडै आखर,
ढाय-ढायती ई उगटावै
नूंवा अबोट,
कद सूं म्हारो
साव उघाड़ो औ तन
ईं माथै थूं
अ आ ई तो रेख देवती!
सांभ्या अतरा साज,
बिना साजिंदां
रागोळ्यां रंभावै,
वै गूंजां-अनुगूंजां
सूत्योड़ै अंतस नै जा झणकारै
सातूं नीं तो
एक सुरो
एकतारो ई तो थमा देंवती!
जिकै झरोखै
जा-जा झांकूं
दीखै सांप्रत नीलक
पण चारूं दिस
झलमल-झलमल
एकै सागै सात-सात रंग
इकरंगी कूंची ई
म्हारै मन तो फेर देंवती!
जिंयां घड़यो थेंघड़ीज्यो,
नीं आयो रच-रचणो
पण बूझण जोगो तो
राख्यो ई थें
भलै ई मत टीप
ओळियो म्हारो,
रै अणबोली
पण म्हारी रचणारी!
सैन-सैन में
इतरो ई समझादै-
कुण सै अणदीठै री बणी मारफत
राच्योड़ो राखै थूं
म्हारो जग ऐड़ो? [‘जिण हाथां आ रेत रचीजै’ से ]


2.
मैंने नहीं
कल ने बुलाया है!
खामोशियों की छतें
आबनूसी किवाड़े घरों पर
आदमी आदमी में दीवार है
तुम्हें छैनियां लेकर बुलाया है
सीटियों से सांस भर कर भागते
बाजार, मीलों,
दफ्तरों को रात के मुर्दे,
देखती ठंडी पुतलियां
आदमी अजनबी आदमी के लिए
तुम्हें मन खोलकर मिलने बुलाया है!
बल्ब की रोशनी रोड में बंद है
सिर्फ परछाई उतरती है बड़े फुटपाथ पर
जिन्दगी की जिल्द के
ऐसे सफे तो पढ़ लिये
तुम्हें अगला सफा पढ़ने बुलाया है!
मैंने नहीं
कल ने बुलाया है!


3.
क्षण-क्षण की छैनी से
काटो तो जानूँ!
पसर गया है / घेर शहर को
भरमों का संगमूसा / तीखे-तीखे शब्द सम्हाले
जड़े सुराखो तो जानूँ! / फेंक गया है
बरफ छतों से
कोई मूरख मौसम
पहले अपने ही आंगन से
आग उठाओ तो जानूँ!
चैराहों पर
प्रश्न-चिन्ह सी
खड़ी भीड़ को
अर्थ भरी आवाज लगाकर
दिशा दिखाओ तो जानूँ!
क्षण-क्षण की छैनी से
काटो तो जानूँ!
[‘एक उजली नजर की सुई’ से]


4.
रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
ऐरावत पर इंदर बैठे
बांट रहे टोपियां

झोलिया फैलाये लोग
भूग रहे सोटियां
वायदों की चूसणी से
छाले पड़े जीभ पर
रसोई में लाव-लाव भैरवी बजत है

रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
बोले खाली पेट की
करोड़ क्रोड़ कूडियां
खाकी वरदी वाले भोपे
भरे हैं बंदूकियां
पाखंड के राज को
स्वाहा-स्वाहा होमदे
राज के बिधाता सुण तेरे ही निमत्त है

रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
बाजरी के पिंड और
दाल की बैतरणी
थाली में परोसले
हथाली में परोसले

दाता जी के हाथ
मरोड़ कर परोसले
भूख के धरम राज यही तेरा ब्रत है

रोटी नाम सत है
खाए से मुगत है
[रोटी नाम सत है]


संपर्क:
पताः छबीली घाटी, बीकानेर फोनः 09413312930

सुभाष चक्रवर्ती के प्रयाण से वामपंथियों को जोर का झटका




प्रकाश चण्डालिया
एक ऐसे वक्त, जबकि पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का गढ़ भेदने में ममता बनर्जी प्रबल पराक्रम के साथ निरन्तर अग्रसर हो रही हैं, वामपंथी आन्दोलन के कद्दावर नेता व राज्य के वरिष्ठ मंत्री सुभाष चक्रवर्ती का प्रयाण वामपंथियों के लिए जोर का झटका है। पिछले 32 सालों से बंगाल में राज कर रहे वामपंथियों के पास विशाल जन समावेश करने का एक ही हथियार था-सुभाष चक्रवर्ती। कोलकाता के विशाल ब्रिगेड परेड मैदान में इन 32 सालों में वामपंथियों ने जब कभी भी विशाल समावेश किया, उसमें सुभाष चक्रवर्ती की अहम भूमिका रही। पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु के मानस सपुत्र माने जाने वाले सुभाष क्रवती वामपंथियों के एक बड़े वर्ग के लिए यदि संकट मोचक थे, तो दूसरे वर्ग के लिए संकट-कारक भी रहे। वाममोर्चा सरकार में उनसे अधिक जनप्रिय और विवादास्पद नेता कोई दूसरा नहीं रहा।
1986 में जब वाममोर्चा सरकार में ज्योति बसु का जादू पूरे परवान था, उन्होंने होप 86 कार्यक्रम का आयोजन करने की ठान ली। वामपंथी महका इस प्रकार के कार्यक्रमों का पैरोकार नहीं रहा, जहां अभिनेत्रियों को नचाया जाए. पर सुभाष चक्रवर्ती ने मिठून चक्रवर्ती को आगे बढ़ाते हुए यहां बाकायदा होप 86 का आयोजन किया और श्रीदेवी सहित तमाम अभिनेत्रियों को खुलेआम नचवाया। इससे वामपंथियों की किरकिरी हुयी, पर सुभाष बाबू के फैसले के आगे ज्योति बसु तक की न चली। वर्तमान बंगलादेश की राजधानी ढाका में 15 मार्च 1942 को जन्म लेने वाले सुभाष चक्रवर्ती बेलगछिया स्थित मोती झील कॉलेज में पढ़ते समय छात्र राजनीति से जुड़े। कुछ दिनों में ही उन्हें छात्र संगठन का सचिव बना दिया गया। बस, इसके बाद फिर उन्होंने कभी मुड़ कर नहीं देखा। 1977 में पार्टी ने उन्हें विधानसभा का टिकट दिया और वे जीतकर विधायक बने। पांच साल बाद दोबारा विधायक बने और इस बार 1982 में ज्योति बसु ने उन्हें युवा व क्रीड़ा विभाग का राज्य मंत्री बनाया। उसके बाद वे लगातार चुनाव जीतते और मंत्री बनते रहे।
सुभाष चक्रवर्ती अपने राजनैतिक जीवन में समरसता का भाव रखा करते थे, यही कारण था कि पार्टी का एक वर्ग उनके खिलाफ हमेशा खड़ा रहता था, जबकि विरोधी खेमा उनका समर्थन करता था। मजदूरों के संगठन सीआईटीयू (सीटू) के वे पर्याय थे। पार्टी नीतियों के खिलाफ वे कई बार मनमानी करते रहे, लेकिन संगठन में उनका विकल्प न होने के कारण चाहकर भी उनके खिलाफ कड़ा पदक्षेप नहीं लिया जा सका। हां, दो एक बार विरोधी गुट (पूर्व सांसद अमिताभ नन्दी का गुट) के हावी रहने के कारण उन्हें हाशिए पर अवश्य रहना पड़ा।
सुभाष चक्रवर्ती ने ज्योति बसु, सरोज दासगुप्ता, प्रमोद दासगुप्ता, अनिल विश्वास, विमान बोस सरीखे शीर्ष वामपंथी नेताओं से बहुत कुछ सीखा, पर वर्तमान मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचाय4 के साथ उनकी कभी नहीं पटी। पार्टी में यदि ज्योति बसु का वजन न रहता तो बुद्धदेव भट्टाचार्य शायद सुभाष चक्रवर्ती को अपने मंत्रिमंडल से कभी बाहर कर देते। बुद्धदेव भट्टाचार्य को प्रारंभिक काल में गैर बंगालियों का विरोधी माना जाता था, जबकि सुभाष च्करवर्ती खुलकर प्रवासी समाज के साथ खड़े होते रहे। बुद्धदेव बाबू ने जब प्रमोटर राज के खात्मे के लिए कमर कसी तो सुभाष चक्रवर्ती खुलकर विरोध में आ गए और बयान दे डाला कि सभी प्रमोटर काला धंधा नहीं करते। इस बयान से मुख्यमंत्री की काफी किरकिरी हुयी, पर वे कुछ न कर पाए। नतीजा यह हुआ कि राज्य में प्रमोटर राज जमकर फला-फूला और आज कोलकाता-राजारहाट अंचल में क्रंक्रीट का जंगल देखा जा सकता है।
सुभाष चक्रवर्ती ही एकमात्र शख्स थे, जो राज्य सरकार के सामने आने वाले संकट के समय खड़े होते थे। धर्मतल्ला अंचल में पीयरलेस होटल के लिए भवन तोडऩे की बात आई, तो जमकर विरोध हुआ। हालात इतने बिगड़ गए कि रैफ तक उतारनी पड़ी। पर सुभाष चक्रवर्ती पुलिस वाहिनी के साथ घटनास्थल पर पहुंचे और सरकार की नाक बचायी। यही नहीं, वर्षों पहले राम नारायण राम पंथ के मुखिया का 55 दिनों तक इस उम्मीद में उनके भक्तों ने दाह संस्कार नहीं होने दिया कि वे किसी भी समय फिर जीवित हो जाएंगे, तब सुभाष चक्रवर्ती आधी रात को उनके आश्रम में पुलिस वाहिनी के साथ पहुंचे और उनके भक्तों को गुरु का दाह-संस्कार करने के लिए बाध्य किया
सुभाष चक्रवर्ती को विवादित छवि के कारण कभी मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं बनने दिया गया। ज्योति बसु की सरकार में सुभाष दा से बुद्देव भट्टाचाय4 इतने नराज हुए कि ज्योति बाबू के मंत्रिमंडल को चोरों का मंत्रिमंडल कहते हुए उपमुख्यमंी पद से इस्तीफा दिया और 9 महीनों तक सरकार से अलग रहे। बाद में समझाए जाने पर फिर सरकार में लौटे, कालान्तर में मुख्यमंत्री बने और सुभाष चक्रकर्ती को मंत्रिमंडल में लेने पर मजबूर हुए।
संकटमोचक होने के बावजूद सुभाष चक्रवर्ती के साथ बुद्धदेव भट्टाचार्य के रिश्ते इतने कड़वे रहे कि एकबार वे पार्टी छोडऩे की बात सोचने लगे। इस दिशा में वे काफी आगे भी बढ़ चुके थे,लेकिन अपने राजनैतिक गुरु ज्योति बसु के समझाने पर यह विचार त्यागा। कहने की आवश्यकता नहीं कि यदि सुभाष बाबू पार्टी छोड़ते तो वाममोर्चा सरकार कब की पलट जाती।
सुभाषदा के नाम से परिचित इस कद्दावर राजनेता की लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी अस्वस्था का समाचार सुनते ही अस्पताल में हजारों समर्थक उमड़ पड़े। यही नहीं स्वभाव से दंभी माने जाने वाले विमान बोस ने जब 3 अगस्त को दोपहर 12 बजे उनकी मृत्यु की घोषा की तो पहली बार लोगों ने उन्हें भी फफक कर रोते हुए देखा।
कहने की आवश्यकता नहीं कि तीन दशकों में अपने अस्तित्व पर आए सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रहे वामपंथियों के लिए सुभाष चक्रवर्ती का जाना वज्रपात से कम नहीं है। वाममोर्चा की ओर से अब जब कभी विशाल समावेश की बात सोची जाएगी, सुभाष चक्रवर्ती की कमी अवश्य खलेगी।
लेखक कोलकाता से प्रकाशित दैनिक राष्ट्रीय महानगर के प्रधान सम्पादक हैं।

सिलीगुड़ी का सुहाना सफर

प्रकाश चण्डालिया
दोस्तो आपके जीवन में भी ऐसे लम्हे कभी न कभी अवश्य आए होंगे, जब किसी मसले पर आप अपने दोस्तों के साथ जमकर हंसे होंगे। ..और ऐसे हंसे होंगे कि ...जब कहना पड़ा होगा...कमबख्त हंसी कब रूकेगी। वैसे, इस बात से तो बेशक आप भी इत्तफाक रखते होंगे कि मशीनी कोलाहल वाली शहरी जिन्दगियां भला कब हंस पाती हैं। आकाश गुंजा देने वाला अट्टहास अब शहरी जिन्दगियों को कब नसीब होता है। बहरहाल, हंसी के जिन क्षणों ने अपनी जिन्दगी में स्थायी स्थान बना लिया है, वह नसीब हुयी इतवार 19 जुलाई 2009 को। तेरापंथ धर्मसंघ की महिला मंडल की सिलीगुड़ी ईकाई के रजत जयंती समारोह में सिलीगुड़ी जाना हुआ था। कोलकाता से हम शनिवार 18 जुलाई को जब रवाना हुए थे, जेहन में सिर्फ एक ही ख्याल था कि रविवार की सुबह कार्यक्रम में वक्तव्य रखना है। ठीक समय पर पहुंचे। मेरे साथ ट्रेन में कुछ और लोग भी थे, जो इसी कार्यक्रम में अतिथि बतौर उपस्थित होने जा रहे थे। रवानगी अच्छी रही। हम सभी सिलीगुड़ी पहुंचे। कार्यक्रम में लगभग पांच-छह सौ लोगों की उपस्थिति थी। सभी वक्ताओं ने काफी मौजूं विचार रखे। इनमें डा. तारा दुगड़, श्रीमती कमला छाजेड़, श्रीमती कल्पना बैद के विचार भी काफी प्रेरणादायक रहे। समणी संचितप्रज्ञा व विनयप्रज्ञाजी के सान्निध्य में आयोजित कार्यक्रम में राज्य के वरिष्ठ नेता व शहरी विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य एवं सिलीगुड़ी के मेयर ने भी शिरकत की। कार्यक्रम में दो शब्द रखने का सौभाग्य मुझे भी मिला। वक्तव्यों की श्रृंखला के बीच सिलीगुड़ी महिला मंडल की बहनों ने विविध कार्यक्रम भी रखे। इनमें भ्रूण हत्या के खिलाफ काफी सराहनीय प्रस्तुति थी। सुखद यह था कि कलाकार सभी तेरापंथी समाज से ही थे, कोई भी पेशेवर न था। इनमें सिलीगुड़ी के मशहूर चिकित्सक डा. सेठिया की धर्मपत्नी श्रीमती मंजु सेठिया का किरदार काफी लम्बा व प्रभावशाली रहा। अपने वक्तव्य में मैं यह कहे बिना न रह सका कि उनके किरदार की गहराई ने लोगों को इतना प्रभावित किया कि कई अवसरों पर दर्शक भावना में बहकर अपनी अश्रुधार न रोक पाए। यह तो अच्छा हुआ कि साथी पत्रकार दिनेश ललवानी ने चिट पर उनका नाम लिखकर याद दिलाया, वरना मैं इस कलाकार की प्रशंसा नहीं कर पाता। कुल मिलाकर कार्यक्रम अत्यन्त सफल रहा। इस यात्रा का आदेश साथी पत्रकार करण मालू ने दिया था। वे खुद भी कार्यक्रमों का बेहतरीन संचालन करते हैं। कविताएं और $गकालें तो जैसे उनके कंठ पर ही रहती हैं। करण भाई दुष्यन्त कुमार के प्रशंसक है, मेरी तरह। यह जानकर और अच्छा लगा। करणजी ने सिलीगुड़ी में एक पुस्तकालय भी दिखाया। भीड़ भरे बाजार में किताबों की कद्र शायद बंगाल ही कर सकता है। कार्यक्रम के उपरान्त सिलीगुड़ी प्रवासियों से मिलने-जुलने में कब दिन बीत गया, पता ही नहीं चला। शाम ढ़ली और फिर शुरू हुयी वापसी की यात्रा। सिलीगुड़ी का रेल स्टेशन है न्यू जलपाईगुड़ी। स्टेशन पर हम कोलकाता वालों को विदा करने महिला मंडल की नयी-पुरानी कार्यकर्ता और पदाधिकारी काफी संख्या में पहुंची थीं। ऐसी सौजन्यता कम ही देखने को मिलती है। हम पांच थे और सबकी टिकटें अलग-अलग कोच में थीं। लेकिन बंगाल में चल रही परिवर्तन की लहर सरीखा लाभ हमें भी मिला। पड़ोसी यात्रियों को हमारे सहयात्री श्री अरूण संचेती ने बड़े प्यार से ठिकाने लगाकर हम सभी को एक स्थान पर बैठा दिया। अरूणजी दुर्लभ मुस्कान के धनी हैं। यही नहीं, माहौल को रसीला बनाने की कला भी कोई उनसे सीखे। ट्रेन की रवानगी के समय ही हम एक स्थान पर आ बैठे। बैठते ही बातों का सिलसिला कुछ यूं शुरू हुआ, गोया किसी टीवी चैनल के कार्यक्रम के स्टूडियो में किसी हंसोड़ धारावाहिक की शूटिंग हो रही हो। इस यात्रा को बीते अभी पांच दिन हुए हैं, फिर भी ऐसा लग रहा है, जैसे हम अभी भी यात्रा में ही हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही एहसास बाकी सब को भी है। बातों का सिलसिला कुछ ऐसा चला कि रात के सवा एक कब बज गए, पता ही नहीं चला। वह तो शुक्र है, बगल वाले कुप्पे के बंगाली बाबू का, जिन्होंने ईष्र्यावश हमें टोका-आपलोग अब बान्द (बन्द) कीजिए। वरना, हम सभी बात-बहादुर सियालदह आने तक अपनी मस्ती में ही डूबे रहते। दोस्तो, परिचय तो आपका भी बहुतों से हुआ होगा। पर आप उन क्षणों को शायद कभी नहीं भूल पाए होंगे जब किसी परिचित के साथ चन्द पलों की भेंट में इतने घुलमिल गए होंगे जैसे वर्षों की जान-पहचान हो। और हम पांचों की मण्डली तो कुछ ऐसे मिली, गोया वर्षों पहले कुम्भ के मेले में बिछुड़े हुए थे। जबकि हकीकत यह थी कि हम परस्पर मिले जरूर, पर कभी इतने अन्तरंग न थे। ट्रेन का यह सफर रत 8 बजे से देर रात्रि के सवा एक बजे तक हमें हंसाता रहा। एक से एक कविताएं और गीतों की वर्षा हुयीं। कभी नीरज, तो कभी डा. कुंअर बेचैन, कभी दुष्यन्त कुमार तो कभी रमानाथ अवस्थी...। यही नहीं,जब कुछ पल के लिए खामोश बैठकर मैं मन्द-मन्द आवाज में गुनगुनाने लगा, तो इसकी सजा भी मिली स्व. मुकेश के गाए गानों को गाने की। मुझ जैसे बाथरूम सिंगर को एक-दो नहीं कम से कम 6-7 गाने गाने पड़े। दाद देता हूं उनके धैर्य की। वैसे भी उन सबकी शायद मजबूरी थी, वरना इस फटे बांस की आवाज पर तो कोई भी भाग लेता....। अरूण संचेती जी के चुटकुलों पर तो ज्योति बसु जैसा हंसी-विरोधी (शायद...क्योंकि पिछले 32 सालों से किसी ने उन्हें हंसता नहीं देखा) भी हंसने लग जाए। हम पांचों के साथ डा. दुगड़, श्रीमती बैद चार्टर्ड अकाउंटेंट और महिला मंडल की राष्ट्रीय पदाधिकारी श्रीमती छाजेड़ भी थीं। जहां तक मैं समझता हूं, महिलाएं अधिक बोला करती हैं, लेकिन ये तीनों देवियां नाप-तौलकर बोलने वाली थीं। फिर भी सफर के माहौल को खुशगवार बनाने में सबने जमकर साथ दिया। और हां, एक और मेहमान थे, मेरे अनुज सरीखे पड़ोसी श्री श्याम मंत्री, जो भाग्यवश इसी कोच में सफर कर रहे थे। हम सबने कम बोलने वाले श्याम मंत्री को भी नहीं बख्शा, और उन्हें भी लपेटा। इन सबकी मौजूदगी के अलावा एक अदृश्य शख्सियत का नाम बार-बार आकर्षण का केंद्र बनता रहा। जी हैं, वही जिनकी अदाकारी का जिक्र मैंने अपने वक्तव्य में किया था। बहरहाल, यह यात्रा सियालदह स्टेशन आने के साथ समाप्त हो गयी, लेकिन सुहाने सफर की यादों का ऐसा उपहार दे गयी, जिसे हम सभी संजो कर रखेंगे। हां, मैं ही नहीं, हम सभी। ...और इन सुनहरे एहसासात को फिर से बांटने के लिए हम सभी ताराजी के निवास पर शुक्रवार 24 जुलाई को एकत्रित हुए. बिताए पलों को फिर ताजा किया। एक-दूसरे को जमकर छेड़ा। सुहाने सफर की देवी ऐसी यात्रा सबको दें।

बुद्धो बाबु देख्चेन की ?



ममता बनर्जी के आह्वान पर २१ जुलाई २००९ को कोलकाता में उमड़ी यह भीड़ देखकर बंगाल में रही परिवर्तन की लहर का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है

वामपंथियों का डूबता जहाज

प्रकाश चण्डालिया
पश्चिम बंगाल में इन दिनों ममता और उनकी तृणमूल का जोर है। शासन में वाममोचाॆ जरूर है, लेकिन ममता के प्रति लोगों का विश्वास इन दिनों देखते ही बनता है। बंगाल में ३२ सालों से राज कर रहे वामपंथियों की हालत इतनी दयनीय कभी नहीं थी। लोकसभा चुनाव के बाद से ही सत्तारुढ़ वामपंथी बचाव की मुद्रा में हैं, जबकि ममता और उनके लोग लोगों का विपुल समथॆन संग्रह कर रहे हैं। कुछ ही महीनों में कोलकाता नगर निगम का चुनाव होने वाला है। फिर २०११ में ममता के कैरियर का सबसे अहम विधानसभा चुनाव भी है। आज के हालात देखकर तो यही लगता है कि वाममोचाॆ अब आने वाले हर चुनाव में शिकस्त खाने को तैयार बैठा है। वामपंथी नेता पूरे राज्य में बचाव की मुद्रा में दिखाई पड़ रहे हैं। चीफ मिनिस्टर बुद्धदेव भट्टाचायॆ की हालत सबसे दयनीय बनी हुयी है। वे चारों तरफ से घिरे हुए हैं।

महाराणा प्रताप कोलकाता में

शश्य श्यामला बंग भूमि पर महाराणा प्रताप की विशाल प्रतिमा लग चुकी है. राजस्थान परिषद् के सद्प्रयासों से यह कार्य संपन्न हुआ है. राजस्थान परिषद् लगभग २५ वर्षों से बंगाल की राजधानी कोलकाता में राणाप्रताप की प्रतिमा की मांग कर रहा था. केंद्र में अटल बिहारी वाजपयी की सरकार के दौरान जब ममता बनर्जी उनकी साथ थी, तब इस कार्य को मंजूरी मिली थी. राणा की प्रतिमा 3 टन की है. चेतक पर भाला लिए सवार राणाप्रताप का रूप देखते ही बनता है. कुछ ही दीनो में इस प्रतिमा का अनावरण कर दिया जायेगा.यह प्रतिमा सेंट्रल अवेनुए से पोद्दार कोर्ट जाने के रास्ते पर तिकोनिया पार्क में लगायी गयी है.

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री श्री ज्योति बासु के साथ राष्ट्रीय महानगर के संपादक प्रकाश चंडालिया का एक एक यादगार चित्र जो ३१ मार्च १९८७ को राजभवन में ज्योति बासु के शपथ ग्रहण समोराह के उपरांत लिया गया.


कोलकाता हरियाणा समाज समिती द्वारा कला मंदिर में आयोजित "कोलकाता का हरियाणा समाज" ग्रन्थ लोकार्पण समारोह के अवसर पर लिए गए चित्र में हरियाणा सरकार के मंत्री श्री।मांगेराम गुप्ता, विधायक श्री दिनेश बजाज, समारोह अध्यक्ष श्री साधुराम बंसल, श्री सज्जन भजनका, श्रीमती मीणा देवी पुरोहित (पार्षद) , श्री घनश्याम अगरवाल, श्री. प्रकाश चंडालिया, श्री।गोविन्दराम धानेवाल, ग्रन्थ के प्रधान संपादक श्री रोशनलाल धोना।

वनबन्धु परिषद् का वार्षिक उत्सव




राष्ट्रीय महानगर के संपादक श्री प्रकाश चंडालिया कोलकाता में रविवार २८ जून को वनबन्धु परिषद् के कोल्कता चैप्टर के वार्षिक उत्सव का सञ्चालन करते हुए. मंचासीन हैं सर्व श्री तरुण विजय, नन्दलाल रुंगटा, सजन भजनका, धर्मचंद अग्रवाल.

वनबन्धु परिषद् का २० वां वार्षिक उत्सव



वनबन्धु परिषद् के कोलकाता चैप्टर के बीसवें वार्षिक उत्सव के दौरान मंच पर सुपरिचित पत्रकार तरुण विजय, राष्ट्रीय महानगर के संपादक व कार्यक्रम के संचालक श्री प्रकाश चंडालिया, प्रधान अतिथि अखिल भारतवर्षीय मारवारी सम्मलेन के अध्यक्ष नंदकिशोर रुंगटा, वनबन्धु परिषद् के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष सजन भजनका और कोलकाता चैप्टर के अध्यक्ष श्री धर्मंचंद अग्रवाल. कार्यक्रम रविवार २८ जून २००९ को जीडी बिरला सभागार में हुआ.

रौशन रहे चिराग सदा




आज बेइंतहा खुश हूं। यह खुशी चिराग ने दी है। यह खुशी कुछ-कुछ वैसी ही है,जब चिराग जन्मा था 7 नवंबर 1992 को। चिराग ने माध्यमिक बोर्ड की परीक्षा आज पास कर ली है। लगभग 75 फीसद अंकों से पास हुआ है वह। इंट्रोडक्टरी आईटी में उसे मिले हैं 82 फीसद अंक। सचमुच यकीन नहीं होता। मां सरस्वती ने परिवार पर आज खुशियों की बौछार कर दी है। पिछले साल जब वार्षिक परीक्षा में दो-एक विषयों में उसे अपेक्षाकृत कम अंक मिले तो बहुत दुःख हुआ था। चिराग की मम्मी की आंखों के आंसू मुझे अभी तक याद है। सीमा को डर था कि दफ्तर से लौटने पर मैं चिराग पर उबल पड़ूंगा। जब घर पहुंचा तो सीमा ने अपनी आंखों से छलकते आंसुओं को रोकते हुए मुझे ढांढस बंधाने की कोशिश की थी। कहा था-कुछ बच्चे अपने आप समय आने पर मेहनत करके अच्छा रिजल्ट ले आते हैं। आप चिन्ता न करें, अगली परीक्षाओं में वह बेहतर करेगा। मैं चुप होकर गुस्सा पी गया था। लेकिन सचमुच भरोसा नहीं था कि चिराग इतने अंक हासिल कर लेगा। पिछले 3-4 महीनों में चिराग ने जिस तरह मेहनत की, वह किसी भी अच्छे छात्र की पूंजी है। कल तक विश्वास नहीं था, पर आज लगता है कि हर विधा में आगे जाने का जज्बा है चिराग में। उसे प्रेरणा देने में सीमा का मौन सहयोग सबसे कारगर रहा। यही नहीं, विक्रम, सोनू, निक्की और श्रेयांश ने जिस तरह उसका मागदर्शन किया, उसे इम्तिहान के आखिरी दिनों में जिस तरह उत्साहित किया, यह किसी भी परिवार के लिए अमूल्य निधि है। विक्रम, सोनू अपना व्यस्त काम छोड़कर भुवनेश्वर से आए। होनहार श्रेयांश ने अपने अनुभवों के आधार पर उसे टिप्स दिए। श्रेयांश खुद काबिल छात्र है। बोर्ड की परीक्षा में पिछले साल वह लगभग 93 फीसद अंक लेकर वह पास हुआ था। निक्की ने भी खूब सहयोग दिया। सबको बधाई और सबका आभार। परसों जब श्रेयांश ने भरोसे के साथ कहा कि चिराग को 80 फीसद अंक मिलेंगे तो सहसा विश्वास नहीं होते हुए भी इसलिए मानने को विवश हुआ, क्योंकि श्रेयांश ने कहा था। वह फिजूल की या मुंहदेखी बातें नहीं करता। इन सबके साथ-साथ चिराग के चहेते चाचा राकेश और अभय,राजू मामा, बड़े भाई प्रभात की प्रेरणा और छोटे भाई नटखट चमन का भी सहयोग रहा। इन सारे बच्चों ने मिलकर घर को आज मां सरस्वती का मंदिर बना दिया है। मां सरस्वती सभी बच्चों को सफलता प्रदान करें, ज्ञानवान बनाएं। चिराग की सफलता पर आज अहमदाबाद में बैठे उसके दादाजी-दादीसा, बड़े पापा-बड़ी मम्मी, चेतन और प्रीति,भुवनेश्वर में बैठी नानीसा और मंजू मौसी, नयी दिल्ली में चाचा-चाची, सुनीता चाची और चिराग की चंचल बहनें सुरभि,पुरवी,प्रज्ञा सहित सभी दोस्त काफी खुश हैं। चिराग की नीता-सीमा और वीणा भुवा- सभी ने फोन पर बधाई दी है।

बेबस बुद्धदेव के जख्मों पर नमक छिड़कने का दौर

प्रकाश चण्डालिया
हमारी पार्टी में सिर्फ एक पोस्ट है-ममता बनर्जी। बाकी हम सब लैम्प पोस्ट हैं। यानि जिसको जहां लगा दिया, वहीं खड़े रहो। पश्चिम बंगाल की अग्निकन्या तृणमूल नेत्री ममता बनर्जी के बारे में उन्हीं की पार्टी के एक नेता ने बातचीत में यह टिप्पणी की थी। इस टिप्पणी से ममता बनर्जी की ताकत का तो अंदाज मिलता ही है, उनके तौर तरीकों की एक बानगी भी मिल जाती है।
आज वही ममता बनर्जी बंगाल में 32 सालों से हुकूमत चला रहे वामपंथियों का काल बनकर उभरी हैं। आलम यह है कि चुनाव नतीजे आने के बाद अपनी पहली बैठक में ही वामपंथियों ने अब जमीन अधिग्रहण की योजनाओं से तौबा कर ली। यही नहीं, बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार खुद मानने लगी है कि वह अब आईसीयू की मरीज बन चुकी है। लगातार तीन दशकों से राज करते-करते वामपंथी इतने दम्भी हो चुके थे कि उन्हें विपक्ष की परवाह तक नहीं थी। विधानसभा में कुछ महीनों पहले जब तृणमूल विधायक जमीन अधिग्रहण के मसले पर चिल्लाचिल्ली करते हुए सरकार से किसानों की जमीन अधिग्रहण न करने की मांग रख रहे थे तो दम्भ में मुख्यमंत्री ने कहा था कि आमरा 235 आछी, आर ओरा मात्रो 30 (यानी हम हमारा संख्या बल 235 है और उनका मात्र 30)। आमरा और ओरा (हम और वो) का समीकरण राज्य विधानसभा में अभी ज्यादा नहीं बदला है, लेकिन मुख्यमंत्री को अब आमरा के मुकाबला ओरा की कुव्वत समझ में आ गयी है।
बंगाल में अगले दो सालों में कई चुनाव होने हैं। कुछ ही दिनों में आधा दर्जन से अधिक विधानसभा सीटों पर वाममोर्चा को ममता की पार्टी से फिर मुकाबिल होना है। ये वे सीटें हैं, जिनके विधायक इस चुनाव में सांसद बन गए हैं। इसके साथ ही कुछ जिला परिषदों में निचले निकाय के चुनाव, फिर अगले साल यानी 2010 में कोलकाता नगर निगम का महत्वपूर्ण चुनाव और फिर अग्निकन्या से जूझने की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा-यानी 2011 में विधानसभा चुनाव। अभी अधिकतर सीटों पर वामपंथियों का कब्जा है। राज्य की अधिकतर जिला परिषदें वामपंथियों के कब्जे में हैं और कोलकाता नगर निगम भी उन्हीं का है।
लोकसभा चुनाव के बाद जो तस्वीर बनकर उभरी है, उसे देखते हुए राज्य की जनता परिवर्तन के मूड में साफ दिखायी पड़ रही है। जनता ही क्यों, वामपंथियों की सबसे बड़ी ताकत राज्य के बुद्धिजीवी तक वामपंथी शासन के खिलाफ लामबन्द होकर खड़े हैं। इनमें महाश्वेता देवी जैसी राष्ट्रीय स्तर की साहित्यकार के अलावा शुभप्रसन्ना, नचिकेता और अन्य दर्जन भर सभी विशिष्ट जन शामिल हैं। इसी जमात के गायक-कलाकार कबीर सुमन को तो ममता बनर्जी संसद पहुंचा चुकी हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अकेले ममता की ताकत से वामपंथी शेर घबराए हुए हैं, और लोकसबा चुनाव में हासिल हुयी करारी शिकस्त के लिए सबसे बड़े वामपंथी पार्टनर माकपा को खुलेआम कोस रहे हैं।
बंगाल की राजधानी कोलकाता सहित अन्यान्य अंचलों में रहने वाले प्रवासी हिन्दीभाषियों की संख्या भी बहुतायत में है। अब तक यह जमात चुप रहती रही। लेकिन अब हिन्दी भाषियों ने भी मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी से सवाल करना शुरू कर दिया है कि 32 वर्षों में आखिर उन्हें एक भी हिन्दी भाषी राज्य मंत्रिमंडल में शामिल करने योग्य क्यों नहीं मिला? यह बड़ा सवाल इसलिए है, क्योंकि प्रवासी समाज की इस आवाज में राजस्थान, हरियाणा, यूपी,बिहार और गुजरात जैसे राज्यों के लोग भारी संख्या में शामिल हैं। वामपंथियों ने हिन्दी भाषियों का हमेशा इस्तेमाल किया, लेकिन बात जब कभी उनके हित को लेकर उठी, तो सभी मौन धारते दीखे। राजस्थानी समाज भूला नहीं कि पिछले साल जनवरी में जब राज्य को सबसे अधिक राजस्व देने वाले मारवाड़ी बहुल बड़ाबाजार अंचल के नन्दराम मार्केट में आग लगी थी, जिसमें हजारों दुकानें दावानल की चपेट में आ गयी थी, तब महज कुछेक फर्लांग की दुरी पर राज्य सचिवालय में बैठे मुख्यमंत्री को इनके आंसू पोंछेने का समय क्यों नहीं मिला? 110 घंटे तक जलते बहुमंजिले नन्दराम मार्केट का हाल जानने मुख्यमंत्री नहीं आए, बल्कि उनके इशारे पर नगर निगम के मेयर विकासरंजन भटटाचार्य ने तो मार्केट के हिस्से तोडऩे के लिए निगम के हथौड़े तक भेज दिए थे। यह अलग बात है कि ममता बनर्जी ने मौके पर पहुंचकर काली का रूप दिखाया, तब जाकर हथौड़े बैरंग लौटे।
राज्य में हिन्दी भाषियों का गुस्सा भी सरकार पर आने वाले दिनों में भारी साबित हो सकता है। हिन्दी भाषी छात्रों के लिए हिन्दी में प्रश्नपत्र का मसला कई सालों से उठाया जाता रहा है, पर सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। अब यह मसला एक बार फिर सरकार के नाक में दम भरने वाला है, क्योंकि ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक मुसलमानों के साथ-साथ प्रवासी समाज के लोगों का हित देखने की भी रणनीति तैयार की है।
आज के हालात देखकर कहा जा सकता है कि अपनी पार्टी में ममता भले एकमात्र पोस्ट मानी जाएं, पर उनके खौफ से वामपंथी सरकार लैम्प पोस्ट की तरह चुपचाप खड़ी नकार आ सकती है। वैसे, वामपंथियों के घटक दलों में माकपा के प्रति जो रोष है, वह मुख्यमंत्री के दर्द पर नमक छिड़कने से कम नहीं है। बेबस मुख्यमंत्री के पास अभी जख्म सहलाने के लिए कोई नहीं है। आने वाले दिनों में उन्हें और कई हारों से मुखातिब होना लाजिमी है।

बंगाल में अल्पमत में आ गए वामपंथी

प्रकाश चण्डालिया
यूपीए में कांग्रेस के बाद सबसे बड़े घटकदल के रूप में उभरी तृणमूल पार्टी की सुप्रीमो ममता बनर्जी इन दो दिनों में अपेक्षा से अधिक परिपक्व दिखायी पड़ रही हैं। मुसलसल संघर्ष के थपेड़े झेल-झेल कर इस बंगाली अग्निकन्या ने बंगाल में वामविरोधी लहर पैदा करने में जबर्दस्त कामयाबी हासिल की है। आलम यह है कि 1991 के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के वोट बैंक में ऐतिहासिक सेंधमारी हुयी है। पिछले विधानसभा चुनाव में वामपंथियों का वोट प्रतिशत लगभग 49 फीसद था, जो इस लोकसभा चुनाव में घटकर 42.6 फीसद पर आ गया है। यही नहीं, वामपंथियों की लोकसभा में 35 सीटें थीं, जो घटकर अब मात्र 15 रह गयी हैं। कई दिग्गज ताश के पत्तों की तरह ढेर हो गए। चौंकाने वाला एक तथ्य यह भी है कि राज्य के मंत्रियों के 27 विधानसभा क्षेत्रों में भी कांग्रेस-तृणमूल को बढ़त मिली है। अर्थात यदि वोटों का सही निचोड़ निकाला जाए, तो कहा जा सकता है कि जो वाममोर्चा 2006 में 294 सदस्यों वाली विधानसभा में 235 सीटें जीत कर आया था, अब अल्पमत में है। लोकसभा चुनावों के आंकड़ों के अनुसार वाममोर्चा मात्र 101 सीटों पर आगे है, जबकि पर कांग्रेस और तृणमूल। भाजपा ने अपना वोट बैंक यहां 1 फीसद से बढ़ाकर 5.6 फीसद कर लिया है, लेकिन सांगठनिक दरिद्रता के चलते वह विधानसभा में कोई दखल देने की स्थिति में नहीं है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आज यदि विधानसबा के चुनाव होते हैं, तो 32 वर्षों से बंगाल की हुकूमत पर बैठा वाममोर्चा आज हार जाएगा।
हार की समीक्षा करने में जुटे बंगाल के वामपंथियों में पार्टी महासचिव प्रकाश करात के प्रति काफी गुस्सा है। यहां के लोग सोमनाथ चटर्जी को फिर से पार्टी में देखना चाहते हैं, लेकिन केरलियन मिजाज इसकी मुखालफत में है। पांचवें चरण के मतदान के बाद राज्य के क्रीड़ा मंत्री सुभाष चक्रवर्ती ने सोमनाथ दा को पार्टी में वापस लाने की बात भी उठायी थी, लेकिन दिल्ली से नेताओं ने संकेत दिया कि सोमनाथदा अपनी भूल के लिए माफी मांगें, तबी विचार किया जाएगा। सोमनाथदा ने माफी मांगने की बात से साफ इनकार तो किया ही, अब पार्टी की बुरी गति के लिए उन्होंने सीधे तौर पर प्रकाश करात को दोषी ठहराते हुए उनसे ही इस्तीफा मांग लिया है। सोमवार को नयी दिल्ली में होने वाली वामपंथियों की बैठक
में बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य नहीं जा रहे हैं। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि वामपंथियों के लिए यह संक्रमण काल का दौर है। पश्चिम बंगाल में 32 सालों के राजत्व में यह पहला मौका है, जब पार्टी इस कदर नीचे गिरी है। माकपा के सहयोगी दल सीपीआई, फारवर्ड ब्लॉक और आरएसपी खुले तौर पर माकपा नेताओं के तौर तरीकों पर उंगली उठा रहे हैं।
आरएसपी नेता और बुद्धेव मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री क्षिति गोस्वामी ने खुले तौर पर अपनी ही सरकार के मुखिया बुद्धदेव भट्टाचार्य को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछले साल नन्दीग्राम में हुयी गोलीबारी के लिए उन्होंने न सिर्फ मुख्यमंत्री को जिम्मेदार ठहराया, बल्कि यहां तककहा कि हत्याकाण्ड के दिन वहां पुलिसिया वर्दी में माकपा के कैडर गोली चला रहे थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि बहुमत के दिनों में हुकूमत पर कुण्डली मार कर बैठे नेता अब हार के बाद खुलेआम एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। बंगाल में वाममोर्चा गठबन्धन के चेयरमैन विमान बोस के खिलाफ हालांकि किसी ने जुबान नहीं खोली है, लेकिन उनके तौर-तरीकों पर दबी जुबान कई वामपंथी नेता गुरेज करते रहे हैं। यूं भी माना जा रहा था कि बंगाल में ज्योति बसु जैसे दिग्गज नेता के रहते कोई खुलकर बगावत नहीं कर सकता, पर अब हार के बाद जो हालात उभर रहे हैं, उनमें वामपंथियों को कुनबे की संभाल रखना भारी पड़ सकता है।
वामपंथियों ने प्रणव मुखर्जी जैसे कांग्रेसी नेताओं का इस्तेमाल कर इस राज्य में हमेशा विपक्षी वोटों को बांटकर रखने में सफलता प्राप्त की थी, लेकिन इस बार सोनिया गांधी के स्पष्ट आदेश के कारण प्रणव बंधे हुए थे, और उन्हें ममता बनर्जी के साथ गठबंधन करना पड़ा। प्रणव मुखर्जी बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, और वर्षों से यहां कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में प्रदीप भट्टाचार्य कांग्रेस का कामकाज संभाल रहे थे। प्रणव मुखर्जी की यह सोची समझी चाल ही थी, वरना वे चाहते तो नन्दीग्राम और सिंगूर काण्ड के दिनों में अपनी पार्टी के नेताओं को वामपंथी सरकार के खिलाफ जागृत कर सकते थे।
बहरहाल, ममता बनर्जी के लिए इस दौर में वक्त का सही मुल्यांकन करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि अगले दो सालों में यहां दो महत्वपूर्ण चुनाव होने जा रहे हैं। सन 2010 में कोलकाता नगर निगम का और फिर 2011 में राज्य विधानसभा का। ऐसे में यदि कांग्रेस के साथ तृणमूल का गठबंधन अटूट रहता है, तो निश्चित तौर पर राइटर्स बिल्डिंग से वामपंथियों को बाहर करने का ममता बनर्जी का सपना साकार हो सकता है। हां, इसमें कांग्रेस के दिग्गज ने ता प्रणव मुखर्जी पर नकार रखना जरूरी होगा, क्योंकि प्रणव मुखर्जी को कांग्रेस में वामपंथियों का पैरोकार माना जाता है। वामपंथियों के परोक्ष समर्थन से ही वे राज्यसभा में पहुंचते थे, और जंगीपुर लोकसभा क्षेत्र में भी उन्हें कहीं न कहीं वामपंथियों का परोक्ष समर्थन मिला ही है।

लेखककोलकाता से प्रकाशित सांध्य दैनिक राष्ट्रीय महानगर के सम्पादक हैं।

क्यों नहीं बन सकती कांग्रेस-भाजपा की साझा सरकार?

प्रकाश चण्डालिया
शत्रुघ्न सिन्हा चूंकि भाजपा से वास्ता रखते हैं, इसलिए सियासी फलक पर कही गयी उनकी किसी भी बात को उसी नजरिए से देखा जाना लाजिमी है। पर उनके नजरिए में गहराई है और यदि देश के समझदार लोग सियासी सोच से ऊपर उठकर देखें तो अपने मुल्क का भला ही होना है।
शत्रुघ्न सिन्हा हालांकि अभिनेता से राजनेता बनने वालों की पहली कतार में हैं, इसलिए अब पक गए हैं। दो दशक से अधिक हो चुका है उन्हें इस फील्ड में। अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना और राज बब्बर जैसे चन्द लोगों के साथ उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में कदम रखा था। बिग बी अमिताभ और बाबू मोशाय राजेश खन्ना तो सलट गए, जबकि राज बब्बर को अपनी मूल विचारधारा छोडऩे के लिए सपा के किटाणुओं ने मजबूर कर दिया। शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा में अपनी पोजीशन के लिए हमेशा सक्रिय रहे और यही कारण है कि इस बार उनने भी अपने नुकीले दांत दिखाने की तैयारी की तो पार्टी को अपने पैंतरे में ढिलायी बरतनी पड़ी और उन्हें उसी दिन पटना सिटी से प्रार्थी घोषित करना पड़ा, जिस दिन वे सपा नेता अमर सिंह के घर की दूरी माप कर आए थे।
हां, तो बात हो रही थी, शॉटगन सिन्हा के हालिया बयान की, जिसमें उन्होंने साफ कहा कि देश में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को मिलकर सरकार बनाना चाहिए। यदि गांधी आज जीवित होते और लालू-पासवान-अमर सिंहों की नौटंकी देख रहे होते, तो निश्चित तौर पर जवाहरलाल नेहरू एवं अटल बिहारी वाजपेयी की आत्माओं को इस बयान पर गहरायी से चिन्तन करने को विवश करते। पर चूंकि यह दौर छींटाकशी का है, एक दूसरे पर फब्तियां कसने का है, इसलिए शत्रुघ्न सिन्हा के बयान को लोग गहराई से नहीं ले रहे। वरना, हम-आप अपने विवेक से पूछें तो खुद समझ जाएंगे कि यदि ये दो पार्टियां आरोपों की जुगाली से बाज आकर देश को मजबूत सरकार देने के लिए राजी हो जाएं, तो निश्चित ही भारत को मौकापरस्त गठबन्धनों से छुटकारा मिलेगा, जातिवाद का ढोल पीटने वाले लालू प्रसाद, मुलायम सिंह,मायावतियों से भी छुटकारा मिलेगा। ममता और जयललिताएं भी अपनी शर्तों पर केंद्र सरकारों को ब्लैकमेल नहीं कर पाएंगी और हां, भारतीय मानसिकता से परहेज रखने वाली वामपंथी शक्तियां भी अपनी औकात में रहेंगी।
सवाल है कि आखिर ऐसा हो क्यों नहीं सकता? भारत एक मजबूत लोकतंत्र है। निचले स्तर पर जो हो, प्रधानमंत्री स्तर पर दो-एक को छोड़ दें तो सभी को देश ने स्वीकार किया है। आज कांग्रेस और भाजपा में समझदार एवं योग्य नेताओं की कमी नहीं है। पर इसके लिए ठोस चिन्तन जरूरी है।
भाजपा को सांप्रदायिक मानने वाली शक्तियों को इस्लाम राग से तौबा करना होगी और भाजपा को भी मंदिर मसले को अपने नाक का सवाल मानना बन्द करना होगा। कांग्रेस ने देश को एक से एक योग्य वित्त मंत्री दिए हैं और भाजपा ने भी वाजपेयी के रूप में सशक्त प्रधानमंत्री दिया है। आज मनमोहन सिंह और आडवाणी सरीखे नेताओं को बेवजह नीचा दिखाने की कोशिश की जा रही है। सियासत के मैदान में चुनावी मैच जीतने के लिए हरसंभव हथकण्डे अपनाए जा रहे हैं। ऐसे में दोनों पार्टियों के योग्य नेताओं के ज्ञान और विवेक का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है।
हां, ऐसा भी नहीं है कि देश में केवल इन्हीं दो पार्टियों में योग्य नेता है। अन्य क्षेत्रीय पार्टियों में भी सशक्त नेता हैं। इनमें वामपंथी कुनबे में भी दो-एक लोग हैं। शरद पवार, शिबू सोरेन, लालू, पासवान सरीखे नेताओं से देश को बचाने की जरूरत है, जो केवल सत्ता के इर्द-गिर्द मंडराने की फिक्र में रहते हैं। अब रामविलास पासवान से किस नीति की अपेक्षा की जाए? देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी, मनमोहन सिंह-किस प्रधानमंत्री की सरकार में नहीं रहे पासवान? क्या यह संभव है कि कोई विचारधारा की लकीर पर चलने वाला इतने समझौते कर ले कि उसे हर सरकार में ठौर मिल जाए। पर मुश्किल यही है- न इन्हें ठौर-न उन्हें और...।
आज नहीं तो कल, कुछेक वर्षों में देश को एक विवेकशील सरकार की आवश्यकता पड़ेगी ही। तब न तो मंदिर का मसला रहेगा, न भाजपा साम्प्रदायिक पार्टी कहलाएगी? आखिर, एक बात तो सभी को सोचना चाहिए कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, क्या वहां मुसलमानों को भोजन नहीं मिलता? क्या अल्पसंख्यकों को नौकरियां नहीं मिलतीं? क्या अल्पसंख्यकों को स्कूल-कॉलेज जाने से रोका जाता है?
भूलना नहीं चाहिए कि लगभग एक दशक पहले जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे और अटलबिहारी वाजपेयी-विपक्ष के नेता। सलमान खुर्शीद तब विदेश राज्य मंत्री हुआ करते थे। जेनेवा के महत्वपूर्ण सम्मेलन में तब भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिेए खुर्शीद के साथ वाजपेयीजी गए थे। यह क्या संकेत है? क्या बड़े मसलों पर देश कभी एक नहीं हुआ है? कारगिल की लड़ाई के समय क्या देश एक नहीं था? पोखरण में यदि वाजपेयी परमाणु परीक्षण का निर्णय लेते हैं, तो क्या इससे भारत का मान नहीं बढ़ा? क्या वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान एनडीए ने डा. एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति नहीं बनाया? वस्तुत: देश में न तो प्रतिभा की कमी है, न ही साधन-संसाधनों की। कमी है तो राजनेताओं में राष्ट्र के विकास के लिए साझा तौर पर काम करने की प्रबल इच्छाशक्ति की। और जब तक यह कमी रहेगी, सियासी फलक पर मायावती, लालू प्रसाद और अमर सिंह जैसों के चेहरे ही देखने को मिलेंगे। शत्रुघ्न सिन्हा की बात एक न एक दिन सच होगी ही। अब इसमे जितना वक्त लगेगा, यह हमारा-आपका, और हां भारत का दुर्भाग्य है।

जीत भी गए तो सलीम साहब को धिक्कार है...

प्रकाश चंडालिया

कोलकाता , 13 मई। पांचवें चरण के मतदान के साथ ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के 15 वें महायज्ञ की पूर्णाहुति हो गयी। पर इस यज्ञ के दौरान लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर के जिन 543 पुजारियों का चयन किया जाना था, उनने किस प्रकार देश के साथ खिलवाड़ किया, यह भी देश - दुनिया ने देखा। मीडिया से लेकर प्रशासन तक सभी-किस प्रकार अनैतिक रूप से पंजा लड़ाते दिखे। पश्चिम बंगाल इससे अछूता कैसे रह सकता था। आज हम अपनी बात बंगाल पर केंन्द्रित करते हैं। राज्य की हुकूमत पर 32 सालों से काबिज वाममोरचा कहीं न कहीं अपनी विचारधारा के लिए माना जाता रहा है। पर इस मोरचे ने लोकसभा में 35 सीटों (केवल बंगाल से, इसमें केरल और त्रिपुरा शामिल नहीं हैं)के अपने वजूद को कायम रखने के लिए जो खिलवाड़ किया, उसकी जितनी निन्दा की जाए, कम है। मतदान के दो चरण (30 अप्रैल और 7 मई)भरपूर हिंसा से मुखातिब हुए। 13 मई के आखिरी चरण के मतदान में वामपंथियों ने वोटरों में दहशत बनाए रखने की कोई कसर नहीं छोड़ी। कई मतदान बूथों को जाम कर दिया गया। मुख्तलिफ पाटिर्यों के एजंटों को धमकाया गया। मतदान की पूर्व रात्रि से विभिन्न इलाकों में आए बाहरी लोगों का जमावड़ा आतंक की सृष्टि करने के लिए काफी था। कोलकाता उत्तर में विपक्षी प्रत्याशी तक को नहीं बख्शा गया। दुःख इस बात का है कि यह सब उस केंद्र में हुआ, जहां वामपंथियों ने मुहम्मद सलीम जैसे सुलझे हुए अपने दिग्गज नेता को मैदान में उतारा था। सलीम साहब को भी पता था कि इस अंचल के मुसलमान मतदाता उनसे नाराज हैं, और इस बार ममता बनरजी की पार्टी के प्रत्याशी सुदीप बंदोपाध्याय के पक्ष में वोट कर सकते हैं, सो सलीम साहब ने मुसलमान मतदाताओं को पटाने के लिए गुजरात काण्ड वाले चित्र प्रसारित किए। ऐसा उन्होंने जानबूझकर कैवल मुसि्लम मतदाता वाले इलाकों में किया। हिन्दू वोटरों वाले इलाके में ऐसा करते, तो उन्हें काफी नुकसान हो सकता था। यह तो रही मतदाताओं में नफरत भरने की बात। मतदान के दिन भी उनकी पार्टी के कैडरों ने जमकर उधम मचाया। बूथ जाम कर दिए, वोटरों को धमकाया भी। इस चुनाव के नतीजे 16 मई को चाहे किसी के पक्ष में जाएं, पर मुहम्मद सलीम जैसे ऊंचे नेता को यह सब करने के बाद यदि जीत मिलती है, तो धिक्कार है। अब कोई कैसे कहे कि वामपंथ की विचारधारा आम आदमी के हक के लिए है। लोकतंत्र के साथ ऐसा खिलवाड़ शोभा नहीं देता। आप जीत भी गए तो सलीम साहब, लोगों के दिलों में राज नहीं कर पाएंगे।

चन्दन है इस देश की माटी....।






प्रकाश चंडालिया





मां, माटी और मानुष का नारा इन दिनों पश्चिम बंगाल में चुनावी नारा बना हुआ है। यह अलग बात है कि नारा देने वालों की निष्ठा भी संदेह के घेरे में है। सियासत के नाम पर जो भी हो,पर इतना तो है कि नारे में है दम...। जहां तक सियासत का मामला है, हम हिन्दुस्तानी अपने नेताओं की वैचारिक गरीबी पर आंसू बहाने के सिवा भला कर भी क्या सकते हैं। एक अच्छे शायर ने इन नेताओं की नौटंकी पर क्या खूब लिखा है-सियासत के तूफान में हैं वे तिनके की तरहउनकी मजबूरी समझता हूं, उनपे खफा होते हुए।बहरहाल, यह तो बात रही सियासत का दांव चलने वालों की। अब मैं बात करना चाहता हूं, मां-माटी और मानुष के नेह की।राजस्थान में चूरू जिले में रतनगढ़ के समीप गांव है राजलदेसर। मेरा जन्म उसी माटी पर हुआ है। लाजिमी है, इस माटी से नेह का नाता रहना। इसी माटी पर जन्मे हैं श्री प्रदीप कुण्डलिया। राजस्थान के कवि स्व. रायचन्द कुण्डलिया के पुत्र हैं वे। माटी के प्रति उनका मोह मैंने हमेशा देखा-परखा है। प्रदीपजी के परिवार पर रामजी की भरपूर मेहर है। उन्होंने देश और दुनिया के तमाम अच्छे-बुरे रंग देखे हैं। दुनिया के कई बड़े देशों की यात्रा की है उन्होंने। कल यानी गुरुवार 8 मई को रात मैं कोलकाता में अपने अखबारी दायित्व निभाकर घर लौट रहा था, तभी मोबाइल पर घंटी बजी। अजीब सा नंबर देखकर चौंक गया। फोन उठाया। उधर से आवाज आई-ठेठ अपनायत से भरी हुयी। प्रदीप बोल रहा हूं-अमेरिका से। मेरे लिए सुखद अनुभूति थी यह। सुदूर अमेरिका में बैठे प्रदीपजी ने मुझे सहसा याद किया, यह मेरे लिए अत्यन्त चौंकाने वाली बात थी। मैंने उनके समक्ष अपनी अनुभूति का बखान किया। उन्होंने स्नेह भाव से मुस्कान भरे अंदाज में अपनी बातें रखी। प्रदीपजी और कनक भाभीजी अपनी लाडली नुपूर से मिलने इन दिनों अमेरिका गए हैं। उन्होंने अपने अंदाज में वहां की सुखद अनुभूतियां बताईं। प्रदीपजी को प्रकृति से कितना गहरा लगाव है, यह मैं अच्छी तरह जानता हूं। अमेरिका के तमाम अनुभव बताने के बाद उनका यह कहना कि अपने गांव की माटी की खुशबू के आगे सब फीका है यार। मैं इत्मीनान से कह सकता हूं कि उनका यह आकलन कोरा थोथा नहीं है। गांव में मैंने उन्हें ठेठ गंवई अंदाज में विचरण करते देखा है। कोलकाता में उनकी शोहरत भी गजब कहर बरपाती है। फिल्में भी बनाईं हैं उन्होंने। कामयाबी के शिखर पर रहे हैं वे। ऐसा व्यक्ति अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी मुल्क की माटी से यदि अपने गांव को याद करता है, तो यही कहना चाहूंगा कि चन्दन है इस देश की माटी....

बंगाल में अग्नि परीक्षा है वामपंथियों की

प्रकाश चंडालिया
लोकसभा चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल का सियासी माहौल निरंतर गर्माता जा रहा है. मतदाताओं को लुभाने के लिए सत्तारूढ़ वाममोर्चा और मुख्या विपक्षी गठबंधन के शरीक दल तृणमूल और कांग्रेस अपने अपने तरीके आजमा रहे हैं. चुनाव में अभी हालांकि काफी समय है, फिरभी ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल इस चुनाव को पूरी गंभीरता से ले रही है. ममता के करीबी नेताओं की माने तो यह चुनाव उनकी पार्टी के लिए क्वार्टर फाईनल है. अगले साल कलकत्ते में नगर निगम का चुनाव होना है, और २०११ में राज्य विधान सभा के चुनाव.बत्तीस वर्षों से राज्य में हूकूमत चला रहे वाममोर्चा की हालत पहली बार थोडी पतली नजर आ रही है. वाममोर्चा के चेयरमैन बिमान बोस के तेवरों में अब वो तल्खी नहीं दिखाई पड़ती, जो आये दिन उनके सम्वात्दाता सम्मेलनों में दिखती थी. बंगाल के राजनैतिक गणित की समझ रखने वाले भी जानते हैं की इस लोकसभा चुनाव में वाममोर्चा की कुछ सीटें घट सकती हैं. इसका सीधा फायदा ममता बनर्जी को मिलेगा. ममता की पार्टी पूरी दुरुस्त हो कर मैदान में उतर चुकी है. हलाँकि प्रणव मुख़र्जी के साथ मिलकर ममता ने कांग्रेस को अपने गठबंधन में साथ लिए है, फिर भी उन्हें कई गरमागरम सवालों से रोज रूबरू होना पड़ रहा है. सिंगूर से टाटा की विदाई पहला अहम् सवाल है, जो हर क्षण ममता के इर्द-गिर्द घूम रहा है. इसमें कोई शक नहीं की यह सवाल शहरी तबके से अधिक उठ रहा है. ग्रामीण इलाकों में ममता ने वाममोर्चा के लाल दुर्ग में गजब की सेंधमारी की है. पहले वाममोर्चा के कर्मी तृणमूल पर हावी रहते थे, पर अब ममता के समर्थक वामपंथी कैडरों पर हावी पड़ रहे हैं.अलग-अलग सूत्रों से प्राप्त गणित को सही मन जाय तो ४२ सीटों वाले इस प्रदेश में वाममोर्चा की सीटें ३५ से घट कर २३-२४ तक सिमट जायेंगी. लगभग २० सीटों पर तृणमूल और कांग्रेस के जीतने की सम्भावना है.भारतीय जनता पार्टी यहाँ पूरी तरह साफ़ दिखाई पड़ रही है. हलाँकि इसके पहले यहाँ से पार्टी ने २ सीटों पर चुनाव जीता था, पर इस बार इसका खता भी खुलेगा, इसमें संदेह है. हाँ, दार्जिलिंग में गणित पलट जाए तो और बात है. ममता स्वयं कलकत्ता दक्षिण से चुनाव लड़ रही हैं. यहाँ से उन्हें हराना, मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन जान पड़ता है. कलकत्ता उत्तर सीट पर पूर्व सांसद सुदीप बनर्जी का मुकाबला वाममोर्चा के मोहम्मद सलीम से है. पुरानी लोकप्रियता और कार्यकुशलता के लिए परिचित सुदीप यदि चुनाव जीत जाएँ, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. मालदह से कांग्रेस की टिकट गाणी खान की भांजी मौसम को मिली है. वे युवा है और विधायक भी. उनकी जीत तय है. अन्य सीटों पर सोमेन मित्र, सुब्रत मुख़र्जी, सुलतान अहमद जैसे नेताओं की प्रतिष्ठा दावं पर है. कुल मिला कर कहा जा सकता है की इस चुनाव में यदि वाममोर्चा की सीटें ३५ से घट कर २० तक सिमट जाते हैं. तो इसके बाद नगर निगम भी उनके हाथ से निकलना तय है. फिर २०११ में भी विधान सभा चुनाव में लाल दुर्ग दह सकता है. वाममोर्चा की मुश्किल है की ज्योति बासु जैसे दिग्गज नेता घर पर बैठ चुके हैं, और मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य बचाव की मुद्रा में दिखाई पड़ रहे हैं. इस चुनाव में मोर्चा का ख़राब प्रदर्शन रहा तो मोर्चा में भी बड़ी टूट हो सकती है. हलाँकि इसकी जमीं तैयार करने में बुद्धदेब मंत्रिमंडल के कुछ पुराने सदस्य लगातार होम वर्क कर रहे हैं.

हिंदू गरीब की भौजाई

पीएम बनने की ख्वाहिश में दर-दर घूम रहे अडवानी
एंडीऐ तो टूट रहा, अब कौन करेगा अगवानी
हर चुनाव के मौसम में नारा देते जय श्री राम
कुर्सी मिलने पर भी लेकिन करते नही राम का काम
केवल थोथे नारों से काम नही चलने वाला
कड़की झेल रहे लोगों का रोज निकलता दिवाला
लालकिशन का लालकिले पर चढ़ना मुश्किल है भाई
अल्पसंख्यक दामाद बना है, हिंदू गरीब की भौजाई
भंग पड़ी पूरे कुवें में, किसको पड़ा है स्वाभिमान
हिंदू मुल्क नही बन जाता, तब तक रोयेगा हिंदुस्तान

वाह इंडिया वाह

1) Qus। : What are you doing? Ans। : Business। Tax : PAY PROFESSIONAL TAX! 2) Qus। : What are you doing in Business? Ans. : Selling the Goods. Tax : PAY SALES TAX!! 3) Qus. : From where are you getting Goods? Ans. : From other State/Abroad Tax : PAY CENTRAL SALES TAX, CUSTOM DUTY & OCTROI! 4) Qus. : What are you getting in Selling Goods? Ans. : Profit. Tax : PAY INCOME TAX! 5) Qus. : How do you distribute profit ? Ans : By way of dividend Tax : Pay dividend distribution Tax 6) Qus. : Where you Manufacturing the Goods? Ans. : Factory. Tax : PAY EXCISE DUTY! 7) Qus. : Do you have Office / Warehouse/ Factory? Ans. : Yes Tax : PAY MUNICIPAL & FIRE TAX! 8) Qus. : Do you have Staff? Ans. : Yes Tax : PAY STAFF PROFESSIONAL TAX! 9) Qus. : Doing business in Millions? Ans. : Yes Tax : PAY TURNOVER TAX! Ans : No Tax : Then pay Minimum Alternate Tax 10) Qus. : Are you taking out over 25,000 Cash from Bank? Ans. : Yes, for Salary. Tax : PAY CASH HANDLING TAX! 11) Qus.: Where are you taking your client for Lunch & Dinner? Ans. : Hotel Tax : PAY FOOD & ENTERTAINMENT TAX! 12) Qus.: Are you going Out of Station for Business? Ans. : Yes Tax : PAY FRINGE BENEFIT TAX! 13) Qus.: Have you taken or given any Service/s? Ans. : Yes Tax : PAY SERVICE TAX! 14) Qus.: How come you got such a Big Amount? Ans. : Gift on birthday. Tax : PAY GIFT TAX! 15) Qus.: Do you have any Wealth? Ans. : Yes Tax : PAY WEALTH TAX! 16) Qus.: To reduce Tension, for entertainment, where are you going? Ans. : Cinema or Resort. Tax : PAY ENTERTAINMENT TAX! 17) Qus.: Have you purchased House? Ans. : Yes Tax : PAY STAMP DUTY & REGISTRATION FEE ! 18) Qus.: How you Travel? Ans. : Bus Tax : PAY SURCHARGE! 19) Qus.: Any Additional Tax? Ans. : Yes Tax : PAY EDUCATIONAL, ADDITIONAL EDUCATIONAL & SURCHARGE ON ALL THE CENTRAL GOVT.'s TAX !!! 20) Qus.: Delayed any time Paying Any Tax? Ans. : Yes Tax : PAY INTEREST & PENALTY! 21) INDIAN :: Can I die now?? Ans :: Please wait, we are about to launch the funeral tax!!!


कवि सम्मलेन के प्रारम्भ में सरस्वती वंदनी प्रस्तुत करते हुए बाल कवि चिरंजीव चमन चंडालिया। मंचस्थ हैं कविवृन्द। नीचे चित्र में देशभक्ति गीतों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तित करते हुए जनाब सलीम नेहली

राष्ट्रीय महानगर के संस्थापक का अभिनन्दन


चित्र परिचय- (ऊपर) राष्ट्रीय महानगर के संस्थापक श्री लक्ष्मीपत सिंह चंडालिया और श्रीमती भीकी देवी चंडालिया के भावभीने अभिनन्दन का चित्र। नीचे- खचाखच भरे हॉल में बैठे सुधि श्रोता । फोटो-सुरेश पटेल (राष्ट्रीय महानगर )

अपनी धरती अपना वतन कार्यक्रम के चित्र

चित्र परिचय- (ऊपर) अतिथिवृन्द तथा नीचे
के चित्र में कवि योगेन्द्र शुक्ल सुमन, नन्दलाल रोशन, जे चतुर्वेदी चिराग, गुलाब बेड और सुनील निगानिया

सिस्टर निर्मला को पद्म पुरस्कार आखिर क्यूँ ?

प्रकाश चंडालिया
राष्ट्रपति द्वारा गणतंत्र दिवस पर नागरिकों के कृतित्व का मूल्यांकन करते हुए जो पद्म पुरस्कार दिए जाते हैं, वे अब ख़ुद अपना सम्मान खोने लगे हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में सरकार का हस्तक्षेप इतना अधिक हो रहा है की ऐरा-गैरा भी पद्म पुरस्कार प्राप्त कर लेता है, जबकि जो इस सम्मान का वर्षों से हकदार है, उसका मूल्यांकन हो नही पाता. कांग्रेस और गाँधी परिवार (बापू का नहीं, इंदिरा गाँधी का) ने पद्म पुरस्कारों को बपौती बना रखा है.मदर टेरेसा की संस्था सँभालने वाली मुखिया को पद्मभूषण से नवाजा गया है. सोनिया गाँधी ने सिस्टर निर्मला को यह पुरस्कार इसलिए दिलवाया होगा, क्यूंकि वह इसाईयत की पर्चाम्बरदार हैं. इस बहने सोनिया और कांग्रेस दुनिया में यह संदेश देना चाहते होंगे की भारत में इसाई बिलकूल महफूज हैं, साथ ही उनके काम का बाकायदा सम्मान और मूल्यांकन भी हो रहा है. अब सोनिया गांधियों के विवेक की जड़ें कितनी खोखली हो चुकीं हैं, यह बताने की जरूरत नही, क्यूंकि पूरे देश में बापू के नाम से भी ज्यादा नेहरू और इंदिरा गांधियों के परिजनों के नाम से रास्ते, सरकारी योजनायें, और पुरस्कार हैं. सरकार भारत की, मनमर्जी इन लोगों की. देश के साथ यह सरासर बलात्कार है, और बहुसंख्यक देशवासियों की भावनावों के साथ खिलवाड़ भी.क्या हमारे देश में रामकृष्ण मिशन, वनबन्धु परिषद्, वनवासी कल्याण आश्रम जैसी संस्थाएं गावों में जाकर संस्कार, शिक्षा, चिकित्सा, स्वरोजगार के साथ साथ अध्यात्मिक चेतना जगाने का कार्य वर्षों से नही कर रहीं हैं? सरकारें एक आंख से फैसले करती हैं, पर राष्ट्रपति तो भारत सरकार का नही होता, वह तो भारत गणराज्य का होता है? इन सरकारों की निगाहें उनके कार्यों पर क्यूँ नहीं पड़तीं ? जैन धर्म के अंतर्गत तेरापंथ धर्मसंघ के वर्त्तमान आचार्य महाप्रज्ञ अस्सी वर्ष की उम्र में चल रहे हैं. पिछले नौ वर्षों से अहिंसा यात्रा पर निकले आचार्य महाप्रज्ञ ने लगभग एक लाख किलोमीटर की पदयात्रा पूरी करली है. दो करोड़ से भी अधिक लोग उनसे सीधे संपर्क में आए हैं. नशा मुक्ति का अभियान, शिक्षा और संस्कार के साथ साथ अध्यात्मिक चेतना फैलाने में महाप्रज्ञ का योगदान वर्तमान दौर में अप्रतीम है. इनके कार्यों का मूल्यांकन कौन करेगा ? क्या ऐसे मनीषियों का मूल्यांकन यह देश इसलिए नही करेगा, क्यूंकि ये मदर टेरेसा की तरह धर्म परिवर्तन नही करवाते, ये बाहरी देशों के इशारे पर भारत की अध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता को नष्ट करने का, खोखला करने का कार्य नही करते ? पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर अब्दुल कलाम स्वयं महाप्रज्ञ जी की अहिंसा यात्रा से इतने प्रभावित रहे हैं की इन नौ वर्षों में वे स्वयं कमोबेश दस बार उनसे मुलाकात करने पहुंचे हैं. दोनों महान विभूतियों ने साझा पुस्तक की रचना भी की है. अध्यात्म और विज्ञानं-जैसे दो मुख्तलिफ विषयों पर उनकी पुस्तक चिंतन के धरातल पर कई नए आयाम पेश करती है. देश लूटने वाले नेताओं के भरोसे यदि, यह सब छोड़ दिया गया, तो सांस्कृतिक एकता भी एक दिन साम्प्रदायिक घेरे में आ जायेगी ? भारत की राष्ट्रपति अपनी गरिमा को ठेस पहुंचाएंगी, यदि इसी प्रकार भारत के मनीषियों, संतों और उनके योगदानों का मूल्यांकन नही किया जाएगा और बाहरी लोगों को पूजा जाएगा. प्रतिभा पाटिल को भूलना नही चाहिए कि वे भारत गणराज्य की राष्ट्रपति हैं, और पूरे देश के साथ न्याय करना उनका धर्म है और दायित्व भी. पद्मश्री पुरस्कारों के चयन में उन्होंने देश की भावना को आहत किया है.

समझौते की बात न हो तो अच्छा है


राष्ट्रीय महानगर कोलकाता महानगर सांध्य दैनिक की तरफ से गत २३ जनवरी को कोलकाता के माहेश्वरी भवन सभागार में "अपनी धरती अपना वतन" कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसकी शुरूआत श्री प्रकाश चण्डालिया के पुत्र चिं. चमन चण्डालिया ने माँ सरस्वती वन्दना से की।


"अपनी धरती अपना वतन"

मंच पर आसीन कवि थे सर्वश्री योगेन्द्र शुक्ल 'सुमन', नन्दलाल 'रोशन', जे. चतुर्वेदी 'चिराग, श्रीमती गुलाब बैद, और सुनील निंगानिया। देशप्रेम की भावना से परिपूर्ण श्री नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की याद में कोलकाता स्थित स्थानीय माहेश्वरी भवन सभागार में किया था। कार्यक्रम के प्रारम्भ में प्रधान वक्ता बतौर श्री कमल गाँधी ने देश के वीर सेनानियों को नमन करते हुए मुम्बई घटना में हुए शहीदों को अपनी भावपुर्ण श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि इन शहिदों के नाम को जितनी श्रद्धा के साथ लिया जाय उतना ही कम है, देश के वर्तमान नेताओं के नाम को लिये बिना आपने कहा कि जिस मंच पर सुभाष-गांधी को याद किया जाना है, वीर शहिदों को याद किया जाना है ऐसे मंच पर खड़े होकर उनका नाम लेकर इस मंच की मर्यादा को कम नहीं करना चाहता। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच श्री कमल गाँधी ने कहा कि हम अभी इतने भी कायर नहीं हुए कि अपने राजनैतिक स्वार्थ के चलते देशहित को तिलांजलि दे देगें, हमारे लिये देशहित सर्वप्रथम है। इस समारोह की अध्यक्षता शहर के जाने-माने समाज सेवी श्री चिरंजीलाल अग्रवाल ने किया। कार्यक्रम का उद्घाटन श्री एस.के पारिक ने किया। बतौर प्रदान अतिथि थे श्री सजन कुमार बंसल और बनवारी लाल सोती। कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष श्री बिमल बैंगानी ने सभी का स्वागत किया और धन्यवाद दिया महानगर के जाने -माने पत्रकार और 'राष्ट्रीय माहानगर' के संपादक श्री प्रकाश चण्डालिया ने कवि मंच " अपनी धरती-अपना वतन" कार्यक्रम के संचालन की शुरूआत श्री सुशील ओझा ने श्री छविनाथ मिश्र की कविता से की:

मेरे दोस्त मेरे हमदम तुम्हारी कसम
कविता जब किसी के पक्ष कें या
किसी के खिलाफ़ जब पूरी होकर खड़ी होती है;
तो वह ईश्वर से भी बड़ी होती है।
-छविनाथ मिश्र


अपनी धरती अपना वतन कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए श्रीमती गुलाब बैद ने माँ सरस्वती पर अपनी पहली रचना प्रस्तुत की।
माँ सरस्वती.. माँ शारदे, हम सबको तेरा प्यार मिले...2
चरणों में अविनय नमन करें,
तेरा बाम्बार दुलार मिले। हे वीणा वादणी, हंस वाहिणी.. तू ममता की मूरत है।
श्री सुनील निंगानिया ने आतंकवाद पर अपनी कविता के पाठ कर बहुत सारी तालियां बटोरी..
शहर-शहर.... गाँव-गाँव मौसम मातम कुर्सी का
आम अवाम लाचार हो गई, देख रही छलनी होते ..
भारत माँ की जननी को .. शहर-शहर....
दिल्ली का दरबार खेल रहा है, खेल ये कैसा कुर्सी का...
यह कैसी आजादी होती, हम आजादी पर रोते हैं
सरहद से ज्यादा खतरा घर की चारदिवारी का... शहर-शहर....
आगे इन्होंने कहा..
उग्रवाद का समाधान नहीं .. राजनीति की दुकानों पे
हासिल करना होगा इसे हमें, अपने ही बलिदानों से..शहर-शहर....
श्री जे. चतुर्वेदी 'चिराग'
धरा पुनः वलिदान मांगती......हिन्द देश के वासी जागो...
जीवन नाम नहीं जीने का, जिस सम अधिकार नहीं हो,
जीवन की परिभाषा तो, अधिकार छीनकर जीना होता...
धरा पुनः वलिदान मांगती......हिन्द देश के वासी जागो...
श्रीमती गुलाब बैद ने अपनी ओजस्वी गीत से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
1.कभी मार सकी मौत तुम्हें, हे अमर वीर बलिदानी...
भारत माँ के सच्चे सपुत हो, सच्चे हिन्दुस्तानी...
जब-जब भारतमाता को, दुश्मन ने आँख उठाकर
सीमा पर ललकारा
तब-तब भारत माँ ने तुम्हें पुकारा....
2.सैनिक जीवन है सर्वोत्तम, सर्वोत्तम सैन्य कहानी
कब मार सकी है मौत तुम्हें
हे अमर वीर बलिदानी...
3. चन्दन है भारत की माटी
महक रहा इसका कण-कण
जिसकी गौरव गाथा गाते
हरषे धरती और गगन.....
श्री नन्दलाल 'रोशन' ने ग़ज़ल और कविताओं के सामंजस्य को इस बखूबी बनाया कि सभी दर्शकगण बार-बार तालियां बजाते चले गये..
-कौन मेरे इस वतन में बीज नफ़रत के बो रहा....
-उनकी जुवां पर पत्थर पिघलने की बात है,
यह तो महज दिल को बहलाने की बात है।
-जो भी आया सामने.. सारे के सारे खा गये
हक़ हमार खा गये.. हक़ तुम्हारा खा गये..
और खाते-खाते पशुओं का चारा भी वो खा गये।
-पल में तौला.. पल में मासा, राजनीति का खेल रे बाबा..
धक-धक करती चलती दिल्ली अपनी.. रेल रे बाबा..
बहुत पुराना खेल रे बाबा...
सां-संपेरे का खेल हो गया.... पकड़ लिया तो बात बन गई,
चुक गया तो मारा गया रे बाबा.....
ताल ठोक संसद जाते, जनता के प्रतिनिधी कहलाते।
सारा ऎश करे य बहीया...
जनता बेचे तेल रे भईया...
पहले मिल बाँटकर खाते.. फिर आपस में लड़ जाते;
स्वाँगों की भी जात !.. फेल हो गई रे बाबा...
डॉ.मुस्ताक अंजूम ने अपनी ग़ज़लों से सभी को मोह लिया।
हजारों ग़म हैं, फिर भी ग़म नहीं है
और हमारा हौसला कुछ कम नहीं है।
और उसकी बात पर कायम है सबलोग
जो खुद अपनी बात पर कायम नहीं है।।
श्री गजेन्द्र नाहटा और श्री आलोक चौधरी जी ने भी अपनी कविताओं का पाठ इस मंच से किया।
गजेन्द्र जी नाहाटा-
दर्द को खुराक समझ के पीता हूँ
और टूटते हृदय को आशाओं के टांके से सीता हूँ।
आलोक चौधरी
जब सुभाष ने शोणित माँगा था.. सबसे करी दुहाई थी,
जाग उठा था देश चेतना.. पाषाणों में, जान आई थी।
कवि मंच "अपनी धरती-अपना वतन" के इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री योगेन्द्र शुक्ल 'सुमन' ने अपनी कविताओं का पाठ शुरू करने से पूर्व कहा कि सभागार में शहर के सो से भी अधिक कवियों की इस उपस्थिति ने यह बता दिया कि कि इस महानगर में भी कवि रहते हैं श्री प्रकाश चण्डालिया का आभार व्यकत करते हुए अपनी दो पंक्तियां कही..
जो दिलों को जोड़ता है, उन ख्यालों को सलाम
अव्वल तुफानों में उन मशालों को सलाम
जो खुद जलकर उजाला बांटता हो उन मशालों को सलाम।
आपने कहा कि वे अपने लोगों से गुजारिश करूँगा कि वे अपने शहर के चिरागों को सामने लायें। आपने "मातृभूमि की बलिवेदी को प्रणाम" कविता का पाठ भी किया.. आपने वर्तमान राजनीति के रंग को अपनी इस कविता के माध्यम से चित्रण किया..
जिन शलाखों के पीछे वह बरसों रहे ... वे अब शलाखों के पहरेदार हैं।
कल तलक जो लुटेरे थे, आज उनकी सरकार है।।
होना हो तो एक बार हो, ये बार-बार होना कैसा है।
और धार चले तो एक बार चले.. धार-धार चलना कैसा है।।
आपने आगे कहा...
तासकंद की रात न हो तो अच्छा है,
शिमला जैसा प्रातः न हो तो अच्छा है,
करगील जैसा घात न हो तो अच्छा है
समझौते की बात न हो तो अच्छा है।

राष्ट्रीय महानगर के कार्यक्रम में उमड़ा देशप्रेमियों का सैलाब

कोलकाता. सांध्य दैनिक राष्ट्रीय महानगर की और से आयोजित कवि सम्मलेन एवं अपनी धरती-अपना वतन कार्यक्रम कई मायनों में यादगार बन गया. कोलकाता में हाल के वर्षों में यह ऐसा पहला सार्वजनिक कवि सम्मलेन था जिसमे भाग लेने वाले सभी कवि इसी महानगर के थे. महानगर के संपादक प्रकाश चंडालिया ने अपने संबोधन में कहा भी, कि यहाँ जब भी कोई सांस्कृतिक आयोजन होता है तो लोग कलाकार का नाम जानने को उत्सुक रहते हैं, लेकिन जब कभी भी कोलकाता में कोई कवि सम्मलेन होता है तो उसका शहर जानने को उत्सुक रहते हैं. इस सोच कि पृष्ठभूमि में शायद यह बात छिपी है कि कोलकाता में शायद अच्छे कवि हैं ही नही. पर राष्ट्रीय महानगर ने इस सोच से मुकाबिल होते हुए इस कवि सम्मलेन में केवल कोलकाता में प्रवास करने वाले कवियों को ही चुना, उन्होंने कहा कि खुशी इस बात कि है कि कोलकाता के कवियों को सुनने पाँच सौ से भी अधिक लोग उपस्थित हुए. वरिष्ठ कवि श्री योगेन्द्र शुक्ल सुमन, श्री नन्दलाल रोशन, श्री जे. चतुर्वेदी चिराग, श्रीमती गुलाब बैद और उदीयमान कवि सुनील निगानिया ने अपनी प्रतिनिधि रचनाएँ सुना कर भरपूर तालियाँ बटोरीं, साथ ही, डाक्टर मुश्ताक अंजुम, श्री गजेन्द्र नाहटा, श्री आलोक चौधरी को भी मंच से रचना पाठ के लिए आमंत्रित किया गया. सभी कवियों ने अपनी उमड़ा रचनाएँ सुनायीं. देशभक्ति, आतंकवाद और राजनेताओं की करतूतों पर लिखी इन कवियों कि रचनाएँ सुनकर श्रोता भाव विभोर हो गए और बार बार करतल ध्वनि करते रहे. कवि सम्मलेन लगभग दो घंटे चला. कवि सुमनजी और रोशनजी ने जबरदस्त वाहवाही लूटी. मुश्ताक अंजुम कि ग़ज़ल भी काफ़ी सराही गई. गजेन्द्र नाहटा ने कम शब्दों में जानदार रचनाएँ सुनाई. गुलाब बैद कि रचना भी काफ़ी सशक्त रही. कार्यक्रम के दूसरे दौर में देश विख्यात कव्वाल जनाब सलीम नेहली ने भगवन राम कि वंदना के साथ साथ ये अपना वतन..अपना वतन.. अपना वतन है, हिंदुस्तान हमारा है जैसी उमड़ा देशभक्ति रचनाएँ सुनकर श्रोताओं को बांधे रखा. संध्या साढ़े चार बजे शुरू हुआ कार्यक्रम रात दस बजे तक चलता रहा और सुधि श्रोता भाव में डूबे रहे. कार्यक्रम का सञ्चालन राष्ट्रीय महानगर के संपादक प्रकाश चंडालिया ने किया, जबकि कवि सम्मलेन का सञ्चालन सुशिल ओझा ने किया. प्रारम्भ में सुश्री पूजा जोशी ने गणेश वंदना की और नन्हे बालक चमन चंडालिया ने माँ सरस्वती का श्लोक सुनाया. कार्यक्रम में अतिथि के रूप में वृद्धाश्रम अपना आशियाना का निर्माण कराने वाले वयोवृद्ध श्री चिरंजीलाल अग्रवाल, वनवासियों के कल्याण के बहुयामी प्रकल्प चलाने वाले श्री सजन कुमार बंसल, गौशालाएं चलाने वाले श्री बनवारीलाल सोती और प्रधान वक्ता सामाजिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन के पैरोकार श्री कमल गाँधी के साथ साथ कोलकाता की पूर्व उप मेयर श्रीमती मीना पुरोहित, पार्षद सुनीता झंवर उपस्थित थीं. कार्यक्रम के प्राण पुरूष राष्ट्रीय महानगर के अनन्य हितैषी श्री विमल बेंगानी थे. उन्होंने अपने स्वागत संबोधन में कहा कि यह आयोजन देशप्रेम कि भावना का जन-जन में संचार सेवा के उदेश्य से किया गया है. कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय महानगर के पाठकों की और से राष्ट्रीय महानगर के संस्थापक श्री लक्ष्मीपत सिंह चंडालिया और श्रीमती भीकी देवी चंडालिया का भावभीना सम्मान किया गया. शहरवासियों के लिए इस कार्यक्रम को यादगार बनाने में सर्वश्री विद्यासागर मंत्री, विजय ओझा, राकेश चंडालिया, गोपाल चक्रबर्ती, विजय सिंह दुगर, गौतम दुगर, पंकज दुधोरिया, हरीश शर्मा, राजीव शर्मा, प्रदीप सिंघी, सरीखे हितैषियों का सक्रिय सहयोग रहा. बदाबजर के महेश्वरी भवन में आयोजित इस विशिष्ट समारोह में सभी क्षेत्र के लोग उपस्थित थे. इस अवसर पर राष्ट्रीय महानगर की सहयोगी संस्था अपना मंच कि काव्य गोष्ठियों के चयनित श्रेष्ठ कवि श्री योगेन्द्र शुक्ल सुमन, श्री नन्दलाल रोशन और सुश्री नेहा शर्मा का भावभीना सम्मान किया गया. सभी विशिष्ट जनों को माँ सरस्वती की नयनाभिराम प्रतिमा देकर सम्मानित किया गया. समारोह में उपस्थित विशिष्ट जनों में सर्वश्री जुगल किशोर जैथलिया, नेमीचंद दुगर, जतनलाल रामपुरिया, शार्दुल सिंह जैन, बनवारीलाल गनेरीवाल, रमेश सरावगी, सुभाष मुरारका, सरदार निर्मल सिंह, बंगला नाट्य जगत के श्री अ.पी. बंदोपाध्याय,राजस्थान ब्रह्मण संघ के अध्यक्ष राजेंद्र खंडेलवाल, हावडा शिक्षा सदन की प्रिंसिपल दुर्गा व्यास, भारतीय विद्या भवन की वरिष्ठ शिक्षिका डाक्टर रेखा वैश्य सेवासंसार के संपादक संजय हरलालका, आलोक नेवटिया, अरुण सोनी, अरुण मल्लावत, रामदेव काकडा, सुरेश बेंगानी, कन्हैयालाल बोथरा, नवरतन मॉल बैद, रावतपुरा सरकार भक्त मंडल के प्रतिनिधि सदस्य, रावतमल पिथिसरिया, शम्भू चौधरी, प्रमोद शाह, गोपाल कलवानी, प्रदीप धनुक, प्रदीप सिंघी, महेंद्र दुधोरिया, प्रकाश सुराना, नीता दुगड़, वीणा दुगड़, हीरालाल सुराना, पारस बेंगानी, बाबला बेंगानी, अर्चना रंग, डाक्टर उषा असोपा, सत्यनारायण असोपा, गोपी किसान केडिया, सुधा केडिया, शर्मीला शर्मा, बंसीधर शर्मा, जयकुमार रुशवा, रमेश शर्मा, सुनील सिंह, महेश शर्मा, गोर्धन निगानिया, आत्माराम तोडी, घनश्याम गोयल, बुलाकीदास मिमानी, अनिल खरवार, डी पांडे, राजेश सिन्हा उपस्थित थे .

राष्ट्रीय महानगर का कार्यक्रम अपनी धरती अपना वतन २३ ko

कोलकाता. सांध्य दैनिक राष्ट्रीय महानगर की और से २३ जनवरी को कोलकाता के माहेश्वरी भवन सभागार में अपनी धरती अपना वतन कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। जाने माने गायक सलीम नेहाली इस कार्यक्रम के विशेष प्रस्तोता होंगे। 26 जनवरी 2006 को भी राष्ट्रीय महानगर ने उनकी ही आवाज में सलाम-ऐ-वतन नाम से देशभक्ति कार्यक्रम आयोजित किया था. सैकडो लोगों ने उस कार्यक्रम को सराहा था. आज भी उस कार्यक्रम की याद लोगों के जेहन पर ताजा है. कार्यक्रम के पहले चरण में राष्ट्रीय महानगर द्वारा स्थापित संस्था अपना मंच की और से कवि सम्मलेन का भी आयोजन किया जाएगा. इस कवि सम्मलेन में कोलकाता के जाने माने कवि सम-सामयिक विषयों पर अपनी रचनाएं पेश करेंगे. इस कार्यक्रम में अपना मंच की काव्य गोष्ठियों में अब तक चुने गए तीन कवियों- योगेन्द्र शुक्ल सुमन, नन्दलाल रोशन और नेहा शर्मा का सम्मान भी किया जाएगा. कार्यक्रम शाम ३ बजे शुरू होगा. कार्यक्रम में राष्ट्रीय महानगर के पाठक आमंत्रित हैं.

श्रीहरि संदेश का लोकार्पण




श्रीहरि संदेश के लोकार्पण अवसर पर महामंडलेश्वर संतोषी माताजी, मणिपुर के मुख्या मंत्री इबोबी सिंह , श्रीहरि सत्संग समिती के श्री सजन कुमार बंसल और श्री सजन कुमार भजनका।

श्रीहरि संदेश का लोकार्पण




श्रीहरिसत्संग समिति कोलकाता के नौ दिवसीय श्रीमद देवी भागवतकथा ज्ञान यज्ञ के दौरान महामंडलेश्वर संतोषी माताजी के सानिध्य में श्रीहरि संदेश का लोकार्पण करते हुए मणिपुर के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह। पास खड़े हैं संस्था के अध्यक्ष श्री सजन कुमार बंसल, श्री सजन कुमार भजनका, मुख्ययजमान श्री सरोज कुमार अग्रवाल,श्रीमती शीला चितलांगिया और पत्रिका के मानद संपादक प्रकाश चंडालिया। कार्यक्रम शक्तिधाम, ४२बी चौरंघी रोड में हुआ। इस दौरान हजारों की संख्या में लोग उपस्थित हुए और कथा से ज्ञानरंजन किया।

जरदारी ख़ुद भक्षक है

कुंवर प्रीतम
पाक सदर की कारस्तानी, देख रही दुनिया सारी
झूठ - फरेब के आसन पर अब बैठ गए हैं जरदारी।
आतंकी भाई उनके, पर बोल रहे नादान से
सबके सब आतंकी जबकि आए पाकिस्तान से।
है औकात नही जालिमो, जख्म जो सीने पर दे पाओ
कितनी बार पिटे सरहद पर, फ़िर भी चाहो आजमाओ।
तालिबानी मंसूबों से, पार नही जो पाओगे
वह दिन दूर नही जब तुम भी तालिबान बन जाओगे।
भारत का तो क्या बिगडेगा, राम हमारे रक्षक हैं
अपनी सोचो पाकिस्तानी जरदारी ख़ुद भक्षक है।

वतन बेचते नेता लोग

पहन के खद्दर निकल पड़े हैं, वतन बेचने नेता लोग

मल्टी मिलियन कमा चुके पर, छूट न पाता इनका रोग

दावूद से इनके रिश्ते और आतंकी मौसेरे हैं

खरी- खरी प्रीतम कहता है, इसीलिए मुंह फेरे हैं

कुर्सी इनकी देवी है और कुर्सी ही इनकी पूजा

माल लबालब ठूंस रहे हैं, काम नही इनका दूजा

सरहद की चिंता क्या करनी, क्या महंगाई का रोना

वोट पड़ेंगे तब देखेंगे, तब तक खूंटी तान के सोना

गद्दारों की फौज से बंधू कौन यहाँ रखवाला है?

बापू बोले राम से रो कर, कैसा गड़बड़झाला है?

कुंवर प्रीतम

करो खिदमत धक्कों से

आतंकी को नही मिलेगी जमीं दफ़न होने को

अपना तो ये हाल कि बंधू अश्क नही रोने को

आंसू सारे बह निकले है, नयन गए हैं सूख

२६ से बेचैन पडा हूँ, लगी नही है भूख

लगी नही है भूख, तन्हा टीवी देख रहे हैं

उन ने फेंके बम-बारूद, ये अपनी सेंक रहे हैं

सुनो कुंवर की बात खरी, ये मंत्री लगते छक्कों से

जाने वाले नही भाइयों, करो खिदमत धक्कों से

कुंवर प्रीतम

ऎसी क्या मजबूरी है?

वाह सोनिया, वाह मनमोहन जी, खूब चल रहा खेल

घटा तेल के दाम रहे जब, निकल गया सब तेल

निकल गया सब तेल कि भईया टूटी कमर महंगाई में

आटा तेल की खातिर घर-घर पंगा लोग-लुगाई में।

देश पूछता आखिर बंधू, ऎसी क्या मजबूरी है?

पी एम् हो तुम देश के, या सोनिया देती मजदूरी है

कुंवर प्रीतम

तेल के दाम में कमी, यानी ऊंट के मुंह में जीरा

प्रकाश चंडालिया

पेट्रोल और डीजल का दाम घटा कर केन्द्र सरकार ने देश की जनता को थोडी राहत अवश्य दी है. लेकिन महंगाई की मार से बेतरह कुचली जा रही जनता के लिए यह ऊंट के मुंह में जीरा देने जैसे बात है. देश का कैसा दुर्भाग्य है कि मनमोहन सिंह, प्रणब मुख़र्जी और पी चिदंबरम जैसे आर्थिक जगत के धुरंधरों के सरकार में रहते हुए भी लोगों को त्रस्त होना पड़ रहा है. वैसे तेल के दाम घटने का यह फ़ैसला चरों तरफ़ से घिर रही कांग्रेस को भी कुछ शुकून जरुर देगा. क्यूंकि इस वक्त उसके सितारे भी ख़राब चल रहे हैं. पूंजी बाजार का भट्टा बैठा हुआ है, सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल चुकी है, देश के प्रमुख राज्यों में भी upa की हालत खस्ता है. एक ऐसे समय, जब इस सरकार ने पुरे देश का तेल निकल दिया है, यह फ़ैसला भी लोगों को ज्यादा फायदा पहुँचायेगा, इस पर संदेह ही है.

अंततः पश्चिम बंगाल विधान सभा में महाकवि कन्हैयालाल सेठिया को श्रद्धांजलि दी गई

प्रकाश चंडालिया

पश्चिम बंगाल विधान सभा में अंततः हिन्दी और राजस्थानी के लब्ध प्रतिष्ठित कवि कन्हैयालाल सेठिया को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। यह राजस्थानी मूल के एक मात्र विधायक दिनेश बजाज के प्रयास से मुमकिन हुआ. आपको याद होगा इसी ब्लॉग पर विधानसभा भूल गई सेठिया जी को श्रद्धांजलि देना-शीर्षक से २३ नवम्बर को अत्यन्त कड़े प्रतिवाद के साथ इस विषय पर लिखा गया था। पिछले २३ नवम्बर को पश्चिम बंगाल विधान सभा में हिन्दी और बंगला जगत की कुछ नामचीन हस्तियों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई. कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े, ये वो लोग थे, जिनका हाल में निधन हुआ था. वैसे जिन लोगों को विधान सभा में २३ नवम्बर को श्रद्धांजलि दी गई, उनमे दो एक नाम ऐसे भी थे, जिन्हें सिर्फ़ वामपंथियों का परिचित होने के लिए शामिल कर लिया गया था. पर दुःख इस बात का था की भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से विभूषित कन्हैयालाल सेठिया का नाम इसमे शामिल नही था. सेठिया जी का जन्म राजस्थान के सुजानगढ़ में हुआ था, लेकिन पिछले लंबे अरसे से वे कोलकता में ही रहते थे और देश की तमाम बड़ी हस्तियां उनसे मुलाकात करने उनके निवास पर ही आती थी। विधान सभा ने २३ नवम्बर को उन्हें इसलिए श्रद्धांजलि न दी होगी क्यूंकि सेठिया जी की काव्यमयी विचारधारा इन सत्ताधारी वामपंथियों के विचारों से मेल नही खाती थी. बहरहाल, युवा विधायक दिनेश बजाज ने इसके ख़िलाफ़ आवाज उठाई और इसका नतीजा यह हुआ की मंगलवार २ डिसेम्बर २००८ को पश्चिम बंगाल विधान सभा में सेठिया जी का परिचय पढ़ा गया, फ़िर सभी विधायकों ने २ मिनट का मौन धारण कर उन्हें याद किया. देर आयद, दुरुस्त आयद...

अपना मंच की काव्य गोष्ठी के चित्र


अपना मंच की गोष्ठी में गूंजे कवियों के स्वर

कोलकाता. संध्या हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय महानगर द्वारा भाषा और साहित्य के अनुरागियों के लिए स्थापित अपना मंच की प्रथम काव्य गोष्ठी शनिवार २९ नवम्बर को राष्ट्रीय महानगर सभा कक्ष में संपन्न हुई. गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ रचनाकार और भारतीय वांग्मय पीठ के प्रणेता प्रो. श्यामलाल उपाध्याय ने की. कार्यक्रम का सफलतापूर्वक संयोजन प्रदीप कुमार धानुक ने किया, जबकि फर्स्ट न्यूज़ के संपादक संजय सनम ने अत्यन्त भावपूर्ण अंदाज में गोष्ठी का सञ्चालन किया. प्रारम्भ में राष्ट्रीय महानगर के संपादक प्रकाश चंडालिया ने गोष्ठी के आयोजन और अपना मंच के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि अपना मंच का मुख्या उद्देश्य नवागत रचनाकारों को मंच प्रदान करना है. अपना मंच की और से हर गोष्ठी में एक अनुभवी और एक उदीयमान रचनाकार को गोष्ठी के श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में सम्मानित किया जाएगा. गोष्ठी में ४५ रचनाकारों में काव्य पाठ किया. वरिष्ठ कवि योगेन्द्र शुक्ल "सुमन" और नन्दलाल 'रोशन' को इस काव्य गोष्ठी के श्रेष्ठ कवि के रूप में चुना गया. इस गोष्ठी में डॉक्टर लखबीर सिंह निर्दोष, मुश्ताक अहमद, कालीप्रसाद जैसवाल, डॉक्टर सेराज खान बातिश, गुलाब बैद, प्रसन्न चोपडा, मृदुला कोठारी, सुशीला चनानी, शम्भू जालान निराला, हरिराम अग्रवाल, सुरेंद्रदीप, विश्वजीत शर्मा विश्व, विजय दुगर, संजय निगानिया, जीतेंद्र जितांशु, सत्य मेधा, राधेश्याम पोद्दार, श्रीकृष्ण अग्रवाल मंगल, रामावतार सिंह, अनीता मिश्रा सरीखे कवि -रचनाकारों ने अपनी रचनाये सुनायीं. जनसत्ता के वरिष्ठ उपसंपादक एवं सुपरिचित लेखक विनय बिहारी सिंह भी गोष्ठी में उपस्थित थे. ज्यादातर कवियों ने मुंबई ब्लास्ट एवं आतंकवाद पर ताजातरीन रचनाएँ सुनायीं. आयोजन की व्यवस्था में गोपाल चक्रवर्ती और हरीश शर्मा का योगदान रहा।

कोलकाता में अपना मंच की काव्य गोष्ठी शनि २८ नवम्बर को

हिन्दी सांध्य दैनिक राष्ट्रीय महानगर के तत्वावधान में अपना मंच की और से शनिवार २८ नवम्बर को सायं ५ बजे से कोलकाता और आसपास के रचनाकारों की एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया है। इस काव्य गोष्ठी का सञ्चालन करेंगे फर्स्ट न्यूज़ के संपादक संजय सनम और संयोजक हैं प्रदीप कुमार धानुक। राष्ट्रीय महानगर के संपादक प्रकाश चंडालिया ने शहर के रचनाकारों को मंच देने की भावना से अपना मंच का गठन किया है। इस ब्लॉग के पाठक बंधू चाहें तो अपनी रचनाएँ mahanagarindia@gmail.com पर भेज सकते हैं। चुनिन्दा रचनाओं का वाचन भी किया जा सकता है। किसी हिन्दी अखबार की और से इस प्रकार की गोष्ठी का यह पहला प्रयास है। कोलकाता या आसपास के बंधू इस गोष्ठी में शामिल होना चाहें, तो उनका भी स्वागत है। गोष्ठी का स्थान है
राष्ट्रीय महानगर सभागार
३०९, बिपिन बिहारी गांगुली स्ट्रीट , २ तल्ला, कोलकाता पुलिस मुख्यालय के पास
कोलकात -१२
संपर्क- ९८३०० ३८३३५

वसुंधरा के राज में, बढ़ रहा राजस्थान




वसुंधरा के तेवर से कांग्रेस हो रही खफा


क्योंकि राजस्थान में फ़िर आ रही भाजपा


फ़िर आ रही भाजपा , कि देखो तेवर सी एम् के


राज चल रहा जयपुर में, और ख्वाब आँखों में पी एम् के


सोनिया देवी नही चलेगी अब और तुम्हारी तिकड़म


राजस्थान तो जीतेंगे ही, दिल्ली में होगा स्वागतम


कुंवर प्रीतम


विधानसभा भूल गई सेठिया जी को श्रद्धांजलि देना

प्रकाश चंडालिया
पश्चिम बंगाल विधान सभा में सोमवार २३ नवम्बर २००८ को कला, साहित्य, संगीत और पत्रकारिता जगत की कुछ विशिष्ट विभूतियों के निधन पर शोक व्यक्त किया गया और दिवंगत आत्मावों को श्रद्धांजलि दी गई. जिन लोगो को विधान सभा में श्रद्धांजलि दी गई, उनमे सभी अपने-अपने क्षेत्र की जानीमानी और चर्चित शक्सियत हैं. हाँ, दो-एक नाम ऐसे अवसरों पर जोड़ दिए जाते हैं, जिनका सत्तारूढ़ पार्टी से सरोकार होता है, और इसी बहने उनकी आत्मावों को भी श्रद्धांजलि देकर शांत कर दिया जाता है. इस बार भी यह परम्परा कोई अपवाद नही थी. पर दर्द देने वाली बात यह है कि विधानसभा में जिन्हें श्रधांजलि दी गई, उनमे हिन्दी और राजस्थानी के शीर्ष कवि कन्हैयालाल सेठिया का नाम नही था. भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से विभूषित सेठिया जी कई दशकों से कोल्कता में ही रहते थे. यही नही, तमाम बड़े नेता कोलकाता आते, तो उनके ६, आशुतोष मुख़र्जी रोड स्थित जाकर ही उनसे मुलाकात करते. इसी २२ नवम्बर को असाम के राज्यपाल शिवचरण माथुर सेठिया जी को श्रद्धांजलि देने उनके निवास गए थे. उनकी सुरक्षा व्यवस्था राज्य सरकार ने ही कि थी. सो, यह तो माना नही जा सकता कि सेठिया जी के नाम से राज्य विधान सभा अवगत नही थी. कोलकाता में राजस्थान और मारवाडी के नाम पर अनगिनत संस्थाएं हैं. कुछ संस्थावों के अखिल भारतीय कार्यालय भी यहाँ ही हैं. अखिल भारतवर्षीय मारवाडी सम्मलेन, राजस्थान फाउंडेशन, पश्चिम बंगाल प्रादेशिक मारवाडी सम्मलेन, राजस्थान परिषद् कोलकाता मारवाडी सम्मलेन जैसी संस्थाओं के पदाधिकारियों को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष प्रतिवाद दायर करना चाहिए. विधान सभा में राजस्थानी समाज के एकमात्र विधायक इसमे सक्रीय भूमिका निभा सकते हैं. यदि यह भूल है, तो उसे निश्चय ही सुधारा जा सकता है, पर यदि इसमे सुधार नही होता है, तो निश्चय ही माना जाना चाहिए कि राजस्थानी समाज के प्रति राज्य सरकार की मनोभावना में कहीं न कहीं खोट अवश्य है. साहित्य, और कला क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति का यदि हम सम्मान नही करेंगे, तो एक दिन हम अपना सम्मान खो बैठेंगे.सामाजिक समरसता कि दुहाई देने वाली साम्यवादी सरकार सेठिया जी के साहित्य अवदानों का मूल्यांकन करते हुए उन्हें अपेक्षित श्रद्धांजलि देगी, ऐसा विश्वास है.

भारतीय संस्कृति संसद में बच्चन के मधुकाव्य पर अभिनव आयोजन




प्रकाश चंडालिया

कोलकाता। हरिवंश राय बच्चन के जन्मशती समारोह के अन्तर्गत संसद परिवार की ओर से आयोजित संगीतमय कार्यक्रम बच्चन का मधुकाव्य शहर के काव्यानुरागी श्रोताओं के लिए यादगार अनुष्ठान बन गया। खचाखच भरे सभागार में लोगों ने मधुशाला एंव अन्यान्य रचनाओं के माध्यम से भरपूर ज्ञानरंजन किया। हाला, प्याला, साकी और मधुशाला रुपी प्रतीकों के माध्यम से कवि के राष्ट्रदर्शन, भक्ति, श्रृंगार, वेदना व ऋतु सम्बन्धी रूबाइयों का प्रस्तुतीकरण विभिन्न रागों में किया गया। जिससे दर्शकमंत्रमुग्ध हो गए। इसके अलावा बच्चनजी की सुप्रसिद्ध कविताएं इस पार-उस पार एवं पथभ्रष्ट की आवृति की गई। मधुकाव्य से सम्बन्धित रोचक संस्मरण एवं बच्चन जी के जीवन से सम्बद्ध प्रेरक घटनाओं का भी जिक्र किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन, संयोजन संस्था के कर्मसचिव श्रीराम चमडिय़ा ने किया। काव्यपाठ आदि में अंशग्रहण किया सर्वश्री काशीप्रसाद खेरिया, गोविन्द फतेहपुरिया, श्यामसुन्दर बगडिय़ा, श्रीराम चमडिय़ा, राजगोपाल सुरेका, महेश लोधा, विजय झुनझुनवाला, विश्वनाथ केडिया, राजीव माहेश्वरी, प्रमोद शाह, केशव बिन्नानी, चंद्रशेखर लाखोटिया एवं सर्वश्रीमती डा। तारा दुगड़, चित्रा नेवटिया, नीता सिंघवी एवं विद्या भण्डारी ने। अनुष्ठान की सफलता के लिए जनसंपर्क प्रभारी अजय अग्रवाल सक्रिय थे।

माफ़ करीज्यो बापूसा

प्रकाश चंडालिया

कोलकाता का साहित्यानुरागी समाज शायद सो गया है। सोया नहीं है तो निसंदेह अपनी सौजन्यता के समृद्ध पारम्परिक पथ से विमुख हो रहा है। धरती धोरां री और पाथळ र पीथळ जैसे अमर गीतों की रचना करने वाले, हिन्दी, राजस्थानी एवं उर्दू की 34 पुस्तकों के रचयिता महाकवि कन्हैयालाल सेठिया की श्रद्धांजलि सभाओं में उपस्थित लोगों की गिनती तो कमोबेश यही संकेत देती है। राजस्थानी समाज के प्रतिष्ठित कार्यक्रमों में कई दशकों तक सक्रिय रहने वाले सेठियाजी के महाप्रयाण को रोकना तो, माना, किसी के वश में नहीं था, पर उन्हें जागरूक समाज पूरी भावना से विदायी देता-यह तो वश में था। एक सप्ताह में अलग अलग स्थानों में सेठियाजी की दो सभाओं का आयोजन हुआ। दोनों सभाओं में मोट उपस्थिति गिनी जाए, तो 200 के आंकड़ों को पार नहीं कर पाएगी।
राजस्थान परिषद के साथ सेठियाजी का जुड़ाव उतना ही गहरा रहा, जितना उनकी अपनी रचनाधर्मिता से। इस परिषद के साथ वे वर्षों तक आत्मीय भाव से प्राण पुरुष के रूप में जुड़े रहे। पर लगता है, वर्तमान में परिषद की बागडोर संभालने वालों के मन में उनके योगदानों पर उत्साह कम, उदासीनता अधिक थी। आम तौर पर राजस्थान परिषद के आयोजनों में ओसवाल भवन के पूरे तल्ले में कुर्सियां लगाई जाती हैं, लेकिन सेठियाजी की शोकसभा में होने वाली उपस्थिति का अंदाजा इन्हें पहले से ही था, सो आधे हॉल को खाली छोड़ दिया गया। जितने में कुर्सियां बिछी थीं, उनमें भी कुछेक मेहमान को तरस रही थीं। राजस्थान परिषद की वार्षिक स्मारिका में प्रवासी राजस्थानियों की जितनी प्रतिनिधि ग्राम संस्थाओं के नाम प्रकाशित होते हैं, उनमें से कईयों के प्रतिनिधि नदारद थे। क्या यह इन संस्थाओं का सामाजिक कर्तव्य नहीं था कि जिन सेठियाजी ने अपना पूरा जीवन राजस्थान और राजस्थानी भाषा के लिए खपा दिया, उनके सम्मान में श्रद्धा के दो फूल चढ़ा आते? प्रतिनिधि संस्थाओं के साथ राजस्थान परिषद का कितना आन्तरिक सम्बन्ध है, यह इसी से उजागर होता है।
मंच पर अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के निवर्तमान होने जा रहे महामंत्री मौजूद थे, जबकि अन्य पदाधिकारियों के पास फुर्सत नहीं थी। शायद सेठियाजी का आकलन लोग ऐसे ही करते हैं। सेठियाजी जन्मना सेठिया होकर भी आमजन के कल्याण के लिए सक्रिय रहे। हरिजनों के लिए खड़े हुए, पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगा, राजस्थानी के लिए भूख हड़ताल पर बैठे, नेताओं से लोहा लिया। पर उन्हें प्रवासी राजस्थानी समाज ने इतनी जल्दी भुलाने का बीड़ा उठा लिया, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
राजस्थान परिषद चाहता तो इस शोकसभा को संकल्प सभा में तब्दील करवा सकता था। सेठियाजी के महाप्रयाण के साथ राजस्थानी को संविधान की मान्यता दिलाने का सपना खत्म नहीं हो गया है। परिषद के कर्णधारों से अपेक्षा है कि वे अब भी सकारात्मक सोच के साथ आगे आएं, ताकि राजस्थानियों की पहचान केवल लोटा-डोरी लेकर आने वालों के रूप में न रह जाए। सेठियाजी तो भाषा, संस्कृति और संस्कार लेकर आए थे। लोटा-डोरी वालों ने अर्थ का घड़ा भरा, पर सेठियाजी ने तो जीवन पर्यन्त साहस और स्वाभिमान का प्रसाद बांटा। जिस कोलकाता महानगर में राजस्थानी समाज की तमाम संस्थाओं के केंद्रीय कार्यालय हों, वहां राजस्थान के सदी के श्रेष्ठ कवियों में अग्रणी सेठियाजी के महाप्रयाण पर रूखी विदाई कई सवाल खड़ा करती है। जो समाज अपने साहित्यकारों को अपेक्षित सम्मान नहीं दे सकता, उसके पराभव को भला कौन रोक सकता है। पारिवारिक आयोजनों में सोने के बाजोट पर अनगिनत पकवान परोसने और दिखावा करने वालों से कोई अपेक्षा नहीं करता, पर जागरूक लोगों का रूखापन तो आंखों में आंसू लाता ही है।

एक नेता की दादागिरी

सही घटना पर आधारित

प्रकाश चण्डालिया
१३ नवंबर की रात बड़ा अजीब वाकया हुआ। कोलकाता महानगर की तंग सड़कों पर गाड़ी वालों के साथ राहगीरों के झगड़े पल-पल की घटना की तरह हैं। बात-बेबात लोग पंगे ले लेते हैं और बात ड्राइवर की पिटाई तक पहुंच जाती है। मामला पुलिस तक जाने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगता।हमारे साथ भी कल कुछ ऐसा ही होना लिखा था। हिन्दी और राजस्थानी के मूधॆन्य कवि पद्मश्री विभूषित श्री कन्हैयालाल सेठिया की शोकसभा से लौट रहा था। वहां एक पुराने साथी मिल गए। भाई ने लौटते में लिफ्ट देकर एहसान किया। उनको दरअसल, यह दिखलाना था कि वे भी अब गाड़ीवाले हो गए हैं। यह अंदाजा मुझे उनके हावभाव से लगा। उनकी निजी औकात गाड़ी लेने लायक बनी नहीं थी, यह मैं इसलिए अच्छी तरह जानता हूं क्योंकि भाई के पास कोई ठाई कमाई का जरिया है नहीं। कई सालों से उनसे परिचित हैं मुझ जैसे कई लोग, फिर भी किसी को आज तक पता नहीं कि भाई की कमाई का जरिया क्या है। बहरहाल, उनकी किस्मत वे भोगें...। पर मेरे रिपोटर दिल ने यह पड़ताल करने में जरा भी वक्त नहीं लगाया कि आखिर उनके दरवाजे तक गाड़ी आई कैसे। भई, उनकी बेटी अभी नगर निगम में पाषॆद हैं। चुनकर आए तीन साल हुए हैं। तो भाई तीन साल में कोई नेता गाड़ी भी ना बना सके तो फिर राजनीति करना घाटे का सौदा नहीं होगा क्या? वैसे इस भाई ने मुझे कई बार कहा है कि उन्हें अब एक नया फ्लैट भी खरीदना है। मेरी तरह आप को भी इस पर चौंकने की जुरॆत नहीं होनी चाहिए। क्यों ठीक कहा ना मैंने? क्यूंकि यह तो होना ही था? निगम के पाषॆद को पगार में क्या पगार मिलती है, यह सभी जानते हैं। लेकिन महानगर में पाषॆद होना और वह भी व्यस्त व्यापािरक अंचल में, किसी बड़े कारखाने के मालिक की कमाई से कम फायदे मन्द तो होता नहीं है...। सो , चलिए, यह तो उनके परिचय का एक हिस्सा है।तो बात हम कर रहे थे, सड़क हादसों की और गाड़ी चलाने वालों की पिटाई की। तो बात १३ नवंबर की है। शाम के वक्त हम कोलकाता में सेठियाजी की शोकसभा से लौट रहे थे। यहां से हम दोनों को ही सत्संग के किसी अनुष्ठान में जाना था। बीच रास्ते में उन नेताजी टाइप प्राणी का घर भी था। सो भाई ने कहा, यार आपकी भाभी भी तैयार हैं, सो उन्हें भी साथ ले लेते हैं। तथास्तु-मैंने कहा। भाभी भी बैठ गईं। अच्छे मूड के साथ गाड़ी में हम बातें करते बढ़ रहे थे िक बड़ाबाजार के बांगड़ बिलि्डंग के समीप धीमी गति से चल रही हमारी गाड़ी के सामने एक कोई ३० साल का युवक पैदल रास्ता पार कर रहा था। उसने गाड़ीचालक को थोड़ा आगे बढ़ जाने को कहा। पाषॆद का बाप गाड़ी में बैठा हो तो किसकी मजाल जो कुछ कह डाले...रास्ता अपने बाप का जो ठहरा...। दो-चार पल ही बीते होंगे िक गाड़ी चालक से उसकी कहासुनी तेज हो गई। मेरे नेताजी दोस्त ने गाड़ी में बैठे-बैठे ही उस लड़के को चमकाने की कोशिश की, तो जवाब भी तीखा ही मिला। नेताजी के चालक को इतने में तैश आ गया। दरवाजा खोलकर वह बाहर कूदा और बीच सड़क पर उस लड़की की धुनाई शुरु कर दी। लड़का और चालक दोनों समान उम्र के थे। पटका-पटकी चलती रही। भीड़ जमा होगई। नेताजी भी उतरे और मजबूरन सामाजिकतावश मुझे भी उतरना पड़ा। दो-चार मिनट में बांगड़ बिल्डंग के समीप की रवींद्र सरणी का रास्ता अखाड़े में तब्दील हो गया। उस लड़के के साथ चल रही कुश्ती में नेताजी की गाड़ी के चालक का माथा फट गया और खून से नेताजी के कुरते की बांह भर गई। भीड़ में से कुछ ने नेताजी का साथ दिया तो कुछ ने उस स्थानीय लड़के का। किसी तरह हमलोगों के बीच बचाव से दोनों को छुड़ा लिया गया। अब शुरु हुआ, अपने-अपने लोगों को बुलाकर हिंसाब बराबर करने का खेल। नेताजी और उस लड़के ने अपने अपने मोबाइल से अपने खास लोगों को झमेले में पड़ने के लिए न्यौता दिया। लड़के का साथ देने कोई आता, उसके पहले ही नेताजी के ८-१० लड़के पहुंच गए और फिर नेताजी के इशारे पर तीन चार लोगों की कॉलर पकड़ कर अपने कब्जे में कर लिया। नेताजी की हिदायत पर उन दो लोगों को भी जबरिया कब्जे में लिया गया, जिन्होंने झमेले के समय नेताजी का विरोध करने की जुररत की थी। मेरा मानना है कि इनका कोई कसूर था नहीं। यहां बताना जरूरी है कि नेताजी की पत्नी यानी पाषॆद की माताजी इस दौरान गाड़ी में तनावग्रस्त मुद्रा में बैठी थीं। उन्हें अकेला देख उनका तनाव दूर करने मैं वहां पहुंचा तो देखा, कुछ लोग उनके सामने विनम्र भाव से इस मुद्रा में खड़े थे, जैसे इस घटना के लिए वे ही दोषी हैं। बहरहाल, नेताजी और उनके गुरगे उन तीन-चार लोगों को पकड़ थाना लेते गए। इस दौरान नेताजी ने मुझे समय नष्ट कर, सत्संग में चले जाने का अनुरोध किया। मैं भला क्या करता...मैं सत्संग में चला गया। दो घंटे बाद वहां से निकलकर मैंने नेताजी महाराज को फोन किया । मेरा मूड उन्हें यह समझाने को था कि जो हुआ सो हुआ, उस लड़के को छुड़वा दीजिए। पर नेताजी भला क्यों मानने वाले थे। उन्होंने कहा, साले को जमकर पिटवा दिया है। नहीं पिटवाते तो वहां नाक कटाई हो जाती। मैं मन मसोसकर चुप रहा। घर लौटा, नींद नहीं आई। सारी रात बेचैन रहा। यह सोचकर कि हम घर से क्या सोचकर निकलते हैं, रास्ते में क्या हो जाता है। वह लड़का तैश जरूर खा गया था, पर उसका आशय नेताजी के चालक का खून निकालता हरगिज नहीं था।बहरहाल, दूसरे दिन सुबह मैंने नेताजी को दोबारा यह सोचकर फोन किया कि बेचारे को किसी तरह छुड़वा दिया जाए। बेकार केस बनेगा और लड़का पुलिस वालों के हत्थे पड़ा रहेगा। नेताजी मेरे निवेदन पर जरा भी नहीं पिघले। बोले, साले को नन-बेलेबल केस दिलवा दिया है। चालक का खून और उनके इशारे पर रात को ही तैयार हुआ मेडिकल रिपोटॆ ने इसमें अहम भूमिका निभाई। नेताजी अपनी नेतागिरि में मस्त हो गए हैं, लड़का थाने में पड़ा सड़ रहा है। क्या ऐसे लड़के ही भविष्य में अपराधी नहीं बनते। मेरा यह सवाल आपकी साॐी में उस नेताजी से है। मुझे मालूम है, मेरा नेता दोस्त इस ब्लॉग पर कभी नहीं आएगा, पर यदि इस जैसा मिजाज रखने वाले नेता टाइप लोग इस पोस्ट को पढ़कर नेतागिरि के नाम पर गुंडागरदी बन्द कर दें, तो लिखना सारथक हो जाएगा। बहरहाल, मैं अपने आप को भी दोषी मानता हूं कि दोस्त नेता को नसीहत नहीं दे सका। एक बार तो मुझे यह भी लग रहा है कि उसने बात इसलिए बढ़ाई कि गाड़ी में उसकी बीवी भी थी। भला कोई नेता अपनी बीवी के सामने हार सकता है ? और वह भी पाषॆद का बाप होकर...।

महाकवि का महाप्रयाण


पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया नही रहे

प्रकाश चंडालिया

हिन्दी और राजास्थानी भाषा के लब्ध प्रतिष्ठित कवि श्री कन्हैयालाल सेठिया आज मौन हो गए। वे ९० वर्ष के थे। भारत सरकार ने साहित्य के खेत्र में उनके अवदानों का मूल्यांकन करते हुए उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा था। सेठियाजीके निधन पर देश भर से शोक संवाद प्राप्त हो रहे हैं। पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत, राजस्थान की मुख्या मंत्री वसुंधरा राजे ने अपने संदेशों में सेठिया जी के साहित्यिक अवदानों के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर उनके कार्यों को मील का पत्थर कहा है। व्यापारिक घराने से होने के बावजूद श्री सेठिया ने कभी भी साहित्य के साथ समझौता नही किया। उनका जन्म राजस्थान के सुजानगढ़ में ११ सितम्बर १९१९ को हुआ था। उनके पिता का नाम छगनमल सेठिया और माता का नाम मनोहारी देवी सेठिया था। सेठिया जी की प्रारम्भिक पढ़ाई कलकत्ता में हुई। स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने के कारण कुछ समय के लिए आपकी शिक्षा बाधित हुई, लेकिन बाद में आपने राजस्थान विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। दर्शन, राजनीती और साहित्य आपका प्रिय विषय था। राजस्थान में सामंतवाद के ख़िलाफ़ आपने जबरदस्त मुहीम चलायी और पिछडे वर्ग को आगे लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत छोडो आन्दोलन के समय आप कराची में थे। १९४३ में सेठिया जी जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया के संपर्क में आए। सेठिया जी को ज्ञानपीठ की और से मूर्तिदेवी साहित्य पुरास्कार १९८८ में दिया गया। उसके बाद आपकी विविध कृतियों के लिए साहित्य अकादमी सहित देश की असंख्य संस्थाओं ने सम्मानित किया।

सेठिया जी की अमर कृतियों में धरती धोरा री राजस्थान का वंदना गीत है, जो करोडो राजस्थानी लोगों के ह्रदय की आवाज है। राणाप्रताप पर उनकी लिखी कविता- पथल आर पीतल काफ़ी लोकप्रिय रही। कुन जमीं रो धनि जैसी सैकड़ों कविताओं के मध्यम से सेठिया जी ने आम आदमी के उत्थान का कार्य किया।

महाकवि के महाप्रयाण पर हार्दिक श्रद्धांजलि .

राष्ट्रीय महानगर का सांध्य संस्करण नए जोश के साथ पुनः शुरू

कोलकाता. तेजतर्रार युवा पत्रकार प्रकश चंडालिया के संपादन में निकलने वाले हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय महानगर का प्रकाशन नए जोश और तल्ख़ तेवरों के साथ फ़िर शुरू हो गया है. महानगर का प्रकाशन पिछले मई महीने में स्थगित कर दिया गया था. कम्पनी की योजना आक्रामक तेवरों वाले टैब्लोइड साप्ताहिक एवं सामाजिक पत्रिका प्रकाशित करने की थी. लेकिन इस दौरान महानगर के सांध्य संस्करण के हजारों पाठकों ने प्रबंधन पर दबाव बनाये रखा और नतीजा यह हुआ कि राष्ट्रीय महानगर का सांध्य संस्करण ४ नवम्बर से फ़िर स्टैंड पर आ गया. जनसत्ता, संडे मेल जैसे अख़बारों में वर्षों तक खोजी पत्रकारिता कर चुके प्रकाश चंडालिया ने कोलकाता में सांध्य पत्रकारिता को नया आयाम दिया है. कई समाचारपत्रों में वे नियमित कालम लिखते रहे हैं. उनकी बेबाक लेखनी और आक्रामक तेवरों से राजनैतिक पार्टियों के नेता और बयान-बहादुर कर्मी बौखलाए रहते हैं. १९९९ में एक राष्ट्रीय पार्टी के गुंडों ने सांध्य अख़बार के दफ्तर में जबरदस्त तोड़फोड़ तक कर डाली थी. गैर हिन्दी भाषी प्रदेश में बगैर किसी औद्योगिक घराने और सरकारी विज्ञापनों के समर्थन के अखबार चलाना और बाकायदा १० वर्षों से पाठकों में लोकप्रिय बनाये रखना, कलम की धार का परिचय देता है. प्रकाश ने बताया कि पाठकों के दबाव के कारण फिलहाल साप्ताहिक संस्करण कि योजना स्थगित कर दी गई है, लेकिन सामाजिक विषयों पर आधारिक पत्रिका का प्रकाशन शीघ्र शुरू किया जाएगा.

मारवाडी शब्द को भुना रहे ठेकेदार

प्रकाश चंडालिया

मारवाडी शब्द को भुना रहे ठेकदार

जैसे तैसे चल पड़े उनका भी कारोबार

उनका भी कारोबार, कि चिंता नही समाज की

मूल जाए गर्त में, पकडो चाबी ब्याज की।

सेठों के पकडो पैर, और उनसे साधो मतलब

झंडा ऊँचा रखो अपना, दिखा-दिखा के करतब।

दिखा दिखा के करतब, यारों परवाह किसकी करनी

थू-थू करे समाज चाहे, वाह-वाह ख़ुद ही करनी

कुछ तो शर्म करो, बेशर्मों , यह कॉम हमारी माता है

जिस्म इसी का, जान इसी की, माँ-बेटे का नाता है।

कहाँ ले जायेंगे ये लोग मारवाडी समाज को ?

प्रकाश चंडालिया

मारवाडी सम्मलेन वालों पर पहले गुस्सा आता था, अब दया आती है। यदि अपने पर गुस्सा किया जाता है, तो इसलिए कि उससे सुधरने की उम्मीद होती है, और जब सुधरने की उम्मीद ही न रह जाए तो कोई गुस्सा करके भी क्या कर लेगा? इतना जरूर है कि समाज की ठेकेदारी करने का तरीका सीखना हो तो पश्चिम बंगाल में मारवाडी सम्मलेन नामक दूकान चलने वालों से सिखा जा सकता है। वह भी बगैर हिंग-फिटकरी के। बुधवार २९ अक्टूबर को पश्चिम बंगाल मारवाडी सम्मलेन के एक गुट ने दिवाली प्रीति सम्मलेन का आयोजन किया। हर साल एक सेठ को बुलाकर प्रधान अतिथि बना दिया जाता है, सो इस बार नयी मुर्गी के तौर पर डनलप के मालिक पवन रूईया को प्रधान अतिथि बना दिया गया. जिस कोलकाता महानगर में लाखों प्रवासी मारवाडी रहते हैं, उसकी तथाकथित प्रतिनिधि संस्था के प्रीति सम्मलेन में बमुश्किल एक सौ लोग भी जुटे. इनमे २०-२५ लोगों को बाकायदा कुर्सियां भरने के लिए लाया गया था. बाकी २५-३० लोगों का कोई सामाजिक सरोकार रहा हो, ऐसा नही लगता. कुछ बुजुर्ग किस्म के लोग जो स्वाभाव से सामाजिकता निभाना जानते हैं, वे मजबूरी में आए हुए थे, सही मायने में ये लोग सम्मान के हक़दार भी थे, पर आयोजकों ने इनकी उपस्तिथि को महत्व नही दिया. शायद इसलिए कि ये लोग मुर्गी नही थे. कुछ गैर राजस्थानी चेहरे भी दिखाई पड़े, ये लोग सौहार्द बढ़ाने आते तो अच्छा लगता, पर दर-हकीकत ऐसा कोई मामला था नही. इन चेहरों को आयाज्जकों ने अपने बचाव में जुटा रखा था. कुछ सालों से ऐसा ही होता है, क्यूंकि आयोजकों का मारवाडी समाज की मूल संस्था अखिल भारतीय मारवाडी सम्मलेन से कोई सरोकार नही है. और दोनों संस्थाओं में कोर्त्बाजी चल रही है. इस संस्था के साथ वर्षों की लड़ाई के बाद भाई लोगों ने मूल संस्था को दरकिनार करते हुए आयोजन पर कब्जा कर रखा है. मंच पर बाकायदा दावा किया जाता रहा कि यह परंपरागत प्रीति सम्मलेन है और पिछले ६५ सालों से आयोजित हो रहा है. जबकि आयोजक संस्था का पंजीकरण हुए ३-४ साल हुए होंगे. जो भी हो-कब्जा सच्चा-झगडा झुटा. बहरहाल, इसका दूसरा पक्ष भी कम कालिख भरा नही है. प्रधान अतिथि पवन रूईया चूँकि सामजिक सरोकार नही रखते, सो बेचारे समाज के महत्व को क्या जानते. ऐसे प्रीति सम्मेलनों में समाज के ज्वलंत विषयों पर बातें होती हैं, पर रूईया जी अपने संबोधन में शेयर बाजार कि वर्त्तमान स्थिति पर ही बोलते रहे. दाम कब बढेगा, घटेगा वगैरह-वगैरह. ऐसा एक तरफा संबोधन सुनकर लोग काना-फूसी करते रहे, पर रूईया जी तो सुइट की चमक दिखाते हुए अपनी बात कहते रहे. एक बार तो उन्होंने हद कर दी. पद्मश्री विभूषित श्रद्धेय कवि कन्हैयालाल सेठिया के मशहूर गीत -धरती धोरां री, के लिए उन्होंने उत्साह में कह दिया कि इस गीत को -धरती धोरां री की बजाय, धरती मारवाडियों की- होना चाहिए. अब उनपर दया नही आए तो क्या किया जाए. ये पैसे वाले कवि के ह्रदय का बोल भी अपने तरीके से निकालेंगे?सम्मलेन में लोगों के लिए अल्पाहार की बात थी, जो या तो केवल आयोजकों के लिए थी, या फ़िर शायद थी ही नहीं. लोग कनबतिया करते रहे की भैय्या नास्ता रखा कहाँ है. या तो हाल है पश्चिम बंगाल के मारवाडियों की संस्था का. दुःख यहीं ख़त्म नही हो जाता. प्रकाश पर्व का प्रीति सम्मलेन करने वाले आयोजकों को शायद पता नही था की ४ बजे शुरू होने वाला कार्यकर्म एक-डेढ़ घंटे चलेगा, और तब तक अँधेरा भी हो जाएगा. सो भाई लोगों ने एक अदद बल्ब की भी व्यवस्था नही की. अंधेरे में ही माइक से वक्ता बोलते रहे, और लोग अंधेरे में बैठे सुनते रहे. अग्रज रचनाकार की ये पंक्तियाँ कितनी सही हैं, ऐसे लोगों के लिए-

हर एक का जहाँ में अरमान निकल रहा है

तोपें भी चल रही हैं, जूता भी चल रहा है

दीवाली पर कोलकाता पुलिस की ज्यादती से परेशान मारवाडी समाज

प्रकाश चंडालिया
तीस वर्षों से पश्चिम बंगाल में राज करने वाले वामपन्थिओं ने अभी तक प्रवासी समाज के साथ ठीक से व्यवहार करना नही सीखा है. राजनैतिक फायदे के लिए अल्पसंख्यकों को दामाद बनाये रखेंगे, लेकिन सभ्य और शालीन प्रवासी समाज के लोगों को बेवजह तंग करेंगे. दीपावली पर प्रदुषण फैलाने के आरोप में कोलकाता पुलिस अनावश्यक रूप से मारवाडी समाज के लोगों को तंग कर रही है, उन्हें बेवाजग गिरफ्तार कर रही है. ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं. पुलिस की नजर में मारवाडी मछली-मुर्गी की तरह होते हैं. इन्हे जब चाहो-जैसे चाहो हलाल किया जा सकता है. वैसे भी दिवाली के समय गिरफ्तार होने वाले गाहे-बगाहे छूटने के लिए जेब हलकी करेगा ही. कोलकाता के मारवाडी बहुल इलाकों मसलन, बडाबाजार, पोस्ता, गिरीश पार्क, लेक टाऊन, हांवड़ा, बांगुर, भोवानिपुर, पार्क स्ट्रीट आदि इलाकों में दिवाली के समय पुलिस की चांदी रहती है. कोई शिकायत करे तौ भी ठीक, न करे तौ भी,आरोप है कि पुलिस अपना धंधा करने से नही चुकती. सही तरीके से कोई समझाए तो भी पुलिस वाले नही मानेंगे, पर यदि किसी दबंग माकपा नेता से फ़ोन करवा दिया जाए तो आनन्-फानन में उसका आदेश मान लिया जाता है.बंगाल में लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि यहाँ साम्प्रदायिक सद्भाव है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि चंद बदनाम दो नम्बरी, टैक्स डकारने वाले, मारवाडी व्यापारियों के गुनाह कि कीमत पुरे समाज को चुकानी पड़ रही है . होली के त्यौहार पर भी पुलिस का तांडव चलता है. मान भी लिया जाय कि यहाँ राज ठाकरे का राज नही चलता, फ़िर भी यह सब जो हो रहा है, वह किस राज का प्रतीक है? बुद्धदेब भट्टाचार्य की सरकार को प्रवासी समाज के साथ वाही व्यवहार करना चाहिए, जो वह अपने लिए उनसे चाहते है.

क्या लाये पापा इस बार

दीवाली तो आ गई पापा, क्या लाये इस बार

बच्चा बोला देखकर, सुबह सुबह अखबार

सुबह सुबह अखबार, कि पापा कपड़े नए दिला दो

मम्मी को एक साड़ी औ बहना को सूट सिला दो

और अपने लिए तो पापा, जो जी में आए लेना

पर घर का कोना कोना, रोशन दीपो से करना

पापा ने सुन बात , कहा बेटे , क्या बतलाएं

डूब गई पूंजी शेयर में, कैसे दीप जलाएं

बेटा बोला, बुरा न मानो, तो एक बात बताएं

पैसे के लालच में पड़कर, क्यूँ पीछे पछ्ताएं

दादाजी भी तो कहते थे लालच बुरी बला है

शेयर नहीं सगा किसी का, इसने तुम्हे छला है

कोई बात नही पापाजी, यह लो शीतल पेय

बीती ताहि बिसारी देय, आगे की सुधि लेय

चिराग-चमन चंडालिया

(अंकल -आंटी- जी आप लोगों को यह रचना कैसी लगी, जरूर बतलाईएगा )

प्रणाम पचास !

बिग बॉस ब्लॉग पर आने वाले सभी बन्धुवों का हार्दिक आभार। मुझे उम्मीद नही थी की चंद दिनों में ही यह ब्लॉग आप सबों को इतना प्रिय हो जाएगा. हमें खुशी है की पिछले कुछ दिनों से बिग बॉस पर होने वाले हिट्स हाफ सेंचुरी पार कर रहे हैं. अवश्य ही अन्य ब्लोग्स पर और ज्यादा हिट्स हो रहे होंगे, पर अपनी रफ़्तार खरामा खरामा बढ़ रही है, यही खुशी की बात है। खुशी के इस मौके पर में ब्लॉग एक्सपर्ट और ehindisahitya.blogspot.com के संपादक-संचालक श्री शम्भू चौधरी का विशेष आभार। यह ब्लॉग १०० प्रतिशत उन्ही की देन है। शम्भूजी मुझ जैसे अनेकों ब्लॉगर बन्धुवों के प्रेरणा श्रोत हैं। उनके अपने तीन ब्लॉग हिन्दी भाषा और साहित्य की अच्छी सेवा कर रहे हैं। एक बार आप सभी आत्मीय बन्धुवों का ह्रदय से आभार और शुभ दीपावली के लिए मंगल कामनाएं . आप सबों के ब्लोग्स पर भी हिट्स निरंतर बढ़ें, यही मंगल भावना है, कामना है ।
इस ब्लॉग का चाल, चरित्र और चेहरा अब आपसे छुपा नही है. फ़िर भी यदि आप इसकी सामग्री में बदलाव चाहते हों तो कृपया अवश्य सूचित करें. इस ब्लॉग के लेखक को आप www.visfot.com और bhadaas.blogspot.com पर भी पढ़ सकते हैं. कई साथी समाचारपत्र के संपादक हमारे आलेखों के लिए संपर्क करते रहते हैं. उनके लिए यही कहना है कि हमारी सामग्री पर कोई कोपी राइट नही लागू किया गया है. आप चाहें तो अपने अखबार के लिए उपयोग कर सकते हैं, पर बाई लाइन देने में ना इंसाफी नही होनी चाहिए.
भाई आपका ही,
प्रकाश चंडालिया

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया


धन्यवाद्


लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर लिखे आलेख पर संजय जी ने प्रतिक्रिया भेजी है, जो इस प्रकार है। इस आलेख को विस्फोट डॉट कॉम ने प्रकाशित किया था। इस आलेख पर प्रतिक्रिया भेजने वाले अन्यसभी भाइयों को भी धन्यवाद्। १३ जनों की प्रतिक्रियाएं इसी पेज पर निचे लेख के साथ लगी हुई हैं.मनोबल बढ़ने के लिए धन्यवाद्.

Lok Nayak's birth day
Hi,
The article by Praksh Chandalia was a good read in a way that it tried to talk about JP.
But I really don't appreciate his blind euologizing of JP and the bland criticsm of those who dont remember him and his movement.
This is actually dynamics of history. We remember certain events or individuals according to the particular historical circumstances and context we r living in.
Lenin is far greater and far more visionary than JP,but Vladimir is not remembered or celebrated these days with the same passion becz he is no longer relevant in the present particular historical situation.
His time might come again.
But his contribution to history can never be forgotten whether we remember him or not.
So JP led a movement, he created people who proved to be more castist,more corrupt than the Congree leaders or policies JP was opposing.
So JP is no longer an inspiration for a new generation when we know who are his political progeny.
JP could not differentiate between the dangers of religious fundamentalism and political chicanery.
Therefore, the author's virulent defence of JP, Sampoorn Kranti was a misplaced kranti guided more by personal vendettal rather than by any vision for the country.
I just wonder what JP would have been doing in the present political context...perhaps leading a regional party or a small socialist party trying to forge alliance with the Congress or the BJP depending on the political exigencies.
Honestly I like ur Hindi and the last line. I love good words.
By profession I am also a journalist by the way. So I understand the pain of passion that the author is undergoing.
Regards
Sanjay

सुशील को फंसाने के ख़िलाफ़ एकजुट हुए पत्रकार

एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें में फंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठक की। इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्ट मौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील को इरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया।इस समिति का संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादक अवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं। यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंह को परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है।दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधी कार्यवाही की जाएगी।बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडिया संस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने की जरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है और समाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने संबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल न देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब वेब माध्यमों से जुड़े लोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यह किसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा किए गए हमले का मामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे।विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने कहा- ''पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों पर आलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना को स्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।''लखनऊ से फोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर आ चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने न सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइट के गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है।बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज ने भोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गए फैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की और इस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की।बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेब माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ा जाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकि उन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है। हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़े लोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता के नाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। पर उन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना को सकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।बैठक में हिंदी ब्लागों के कई संचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।

हे सरस्वती माँ !



चमन चंडालिया

हे ! सरस्वती माँ हमे विद्या दो ,

हम चंचल हैं पर हैं तुम्हारे आज्ञाकारी ,

बुद्धि और वाणी में मधुरता दो

तुम हो माँ शारदे ,

हम तुम्हारे ही भजन सुनाते ,

तुम्हारी शरण में आ कर सब, मग्न हो जाते
तुम जब वीणा बजाती ,

अपनी मधुर धुनों से ,

सबको अपने पास बुलाती
हे ! सरस्वती माँ ,

हमें पढने की शक्ति दो ,

हमें विद्या दो
२२ अक्टूबर २००८

मेरा ननिहाल

चमन चंडालिया
मेरे नानोसा का नाम है जीवनमल ,
थे अपने काम में बिलकुल सरल
कमलादेवी है मेरी नानिसा ,
घर है उनका उड़ीसा
बड़े मामा है मेरे रणजीत दुगड़ ,
निकाल सकते हैं वह किसी की भी जड़
मामीसा है मेरी इन्द्रानी ,
है पूरी राजस्थानी
ममेरे भइया है मेरे विक्रम ,
अच्छा नही खेलते वह कैरम
छोटे भैया मेरे राहुल ,
है वह एकदम ठंडा-ठंडा कूल कूल
बहन है मेरी नीरा ,
बनती है वह अच्छा आटा का सीरा
मामा है मेरे गजराज ,
अच्छी है उनकी आवाज
मामीसा का नाम है पुष्पादेवी ,
बनाती है वह अच्छी ग्रेवी
बहन है मेरी नंदिनी ,
खाती है वह बहुत चीनी
बहन है मेरी निवेदिता ,
पड़ सकती है वह पूरी गीता
बहन है मेरी नेहल ,
सोचती है कर लेंगे काम कल
छोटे मामा का नाम है राजकुमार ,
चलाते हैं वह अच्छी कार
छोटी मामीसा का नाम है मंजुश्री ,
नही रह सकती वह कभी भी फ्री

चमन चंडालिया की पहली कविता

प्रकाश चंडालिया के छोटे बेटे चमन चंडालिया (१० वर्ष ) का यह पहला काव्य प्रयास है। सुधी पाठकों की प्रतिक्रिया उसे प्रोत्साहित करेगी ।

चमन चंडालिया

लक्ष्मीपत सिंह चंडालिया है मेरे दादाजी ,
नही करते किसी काम में दखल-अंदाजी
भीकी देवी चंडालिया है मेरी माँ,
नही करती हमें कभी भी ना
प्रमोद चंडालिया है सबसे बड़े
हर मुश्किल में सबके साथ खड़े
अनीता है मेरी बड़ी मॉम
कर सकती है वह मेरे लिए कोई भी काम
मेरे पापा का नाम है प्रकाश
कर सकते है वो किसी का भी परदाफाश
सीमा है मेरी मम्मी का नाम
करती है वह सारे काम
प्यारे चाचा है मेरे राकेश
अनुशासन न रहे तो हमको देते केस
सुनीता है मेरी चाची का नाम
खाना बनाना है उनका काम
अभय है मेरे चाचा का नाम
करते हैं वह बहुत बड़े-बड़े काम
कविता है मेरी चाची का नाम
चाचा की वजह से है चाची का नाम
बड़े भाई है मेरे गुड्डू
है वह एकदम गोल लड्डू
चस्मल्लू भाई है मेरे चेतन
है वह एकदम शान्तिनिकेतन
बड़ी बहन है मेरी प्रीति
हार जाए तो भी कहे, मै तो जीती
चिराग है मेरे बड़े भाई का नाम
बास्केटबाल खेलना है उसका काम
बदमाशी करना है मेरा काम
चमन चंडालिया है मेरा नाम
सुरभि है मेरी बहन का नाम
मुझसे लड़ना है उसका काम
पुरवी है मेरी बहन का नाम
अच्छा लगता उसे करना काम
चहक है मेरी बहन का नाम
करती है वह बदमाशी के काम
गर्व चंडालिया है मेरा भाई ,
हरदम उसने चाची से डांट खाई
प्रज्ञा है नन्ही बहन का नाम
सब करते हैं उसके लिए काम।
१९ अक्टूबर २००८

खुशवंत सिंह जरा सोचें




प्रकाश चंडालिया
मशहूर साहित्यकार खुशवंत सिंह ने अपने कालम में मनमोहन सिंह और लालकृष्ण आडवाणी पर टिपण्णी की है. उम्र के जिस पडाव पर खुशवंत सिंह हैं, वहां उनसे निष्पक्ष सोच की उम्मीद की जाती है, लेकिन जिस तरीके से उन्होंने मनमोहन सिंह की तरफदारी करते हुए लालकृष्ण आडवाणी को घेरने की कोशिश की है, उससे यही लगता है सरदारों पर जो चुटकुले बने हैं, वो सब खुशवंत सिंह के मिजाज को देखते हुए ही बनाये गए हैं. मनमोहन सिंह बेशक इमानदार हो सकते हैं. कांग्रेस वालों का बैकग्राउंड देखते हुए उन्हें निश्चय ही अपवाद कहा जा सकता है, लेकिन एक अर्थशास्त्री के रूप में उनकी उपलब्धियों को देखते हुए आज की महंगाई के लिए उन्हें बरी कैसे किया जा सकता है. लालकृष्ण आडवाणी से नाइत्तफाक रखने वाले उनसे लाख विषयों पर बैर कर सकते हैं, लेकिन इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि आडवाणी एक सुलझे हुए नेता हैं, किसी भी विषय पर अपनी सोच रखते हैं, इतिहास का अध्ययन उनने मनमोहन सिंह से ज्यादा किया है. जो कांग्रेस पार्टी आज देशी अध्यक्ष नही जुटा सकती, जो पार्टी सोनिया गाँधी के इशारे पर नरसिम्हा राव कि उपलब्धियों को जमींदोज कर सकती है, जिसका प्रधानमंत्री सुपर पॉवर सोनिया गाँधी के कहे पर चलने को मजबूर हो, वह दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक मुल्क के लिए सम्मान का हक़दार तो नही है. भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि सोनिया गाँधी ने अपनी ताकत मजबूत बनाये रखने के लिए देश को कमजोर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति परोस दिया. कमसे कम जिस पार्टी से अडवाणी का नाता है, उसने देश को ऐसा राष्ट्रपति दिया, जिन्होंने देश का मान दुनिया भर में बढाया . डॉक्टर अब्दुल कलाम भूतपूर्व राष्ट्रपति होने के बावजूद देश और दुनिया में जाते हैं, और लोग उन्हें सुनने और उनसे सीखने के लिए लालायित रहते हैं. जैसी सोनिया गाँधी, वैसी प्रतिभा पाटील . हालांकि इंदिरा गाँधी ने ज्ञानी जैल सिंह के रूप में देश को सबसे कमजोर और रबर स्टांप राष्ट्रपति देने में कोई कोर कसार नही छोड़ी पर उनकी विदेशी बहु सोनिया गाँधी तो एक डेग आगे निकल गई. पाटिल से कमजोर राष्ट्रपति तो ज्ञानीजी भी नही थे. आलम ये कि भारत की राष्ट्रपति महामहीम प्रतिभा पाटील विदेश गयीं तो कुर्सियां खाली पड़ी रहीं, कमजोर उपस्तिथि देखते हुए उनके २-३ कार्यकर्म रद्द तक करने पड़े. जबकि उसी दौर में अब्दुल कलाम भी अन्य देशों कि यात्रा पर थे, और एक एक दिन में कई-कई हाउस फुल सभाएं कर रहे थे. किस कांग्रेस का गुण गा रहे हैं खुशवंत जी.
आडवाणी को सांप्रदायिक कहने वाले खुशवंत सिंह को भूलना नही चाहिए कि उनकी पार्टी के शाशन काल में देश का राष्ट्रपति मुसलमान था और रक्षा मंत्री इसाई. जिस भाजपा पर कांग्रेस साम्प्रादायिकता का आरोप लगा कर राजनैतिक रोटियां खाती रही है, उसे भी कभी भारत के हिंदू नागरिकों के हित के लिए कोई कदम उठा कर अपनी धर्मनिरपेक्षता साबित करनी चाहिए. कांग्रेस ने मुसलमानों कि मिजाजपुर्सी के लिए न सिर्फ़ हिन्दुओं के हितों के साथ अन्याय किया बल्कि सिखों के सम्मान को भी ठेस पहुंचाई है. खुशवंत साहब का मिजाज हमेशा महिलाओं में खोया रहता है, इसीलिए शायद वे इतिहास भूलने लगे हैं. आडवाणी प्रधानमंत्री बनेंगे या नही, यह वक्त बताएगा, पर इस कड़वे सच को कोई झुठला नहीं सकता कि सोनिया गाँधी के परचम बरदार मनमोहन सिंह जी बंधुवा प्रधानमंत्री हैं. दुनिया के सबसे बड़े अर्थ शास्त्रियों में जिनका नाम शुमार बताया जता है, और जो भारत में आर्थिक उदारीकरण का पुरोधा माना जाता है, उसके शासन काल में भारत कि अर्थ व्यवस्था का सत्य नाश हो चुका है. मुल्क को बंधुआ प्रधानमंत्री कांग्रेस ही दे सकती है.खुशवंत सिंह जी अपने कालम में ख़ुद कबूल करते हैं कि नेहरूजी ने अपने दौर में भाई भतीजावाद को खुलकर बढाया. यही काम सोनिया गाँधी कर रही हैं. अडवाणी जी पर यह इल्जाम कोई कैसे लगा सकता है. कांग्रेस में तो इंदिरा -नेहरू खानदान के बावर्ची और दरवान तक टिकटों कि दावेदारी करते रहते हैं. सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वढेरा को एअरपोर्ट पर सुरक्षा जांच से ऊपर रखा जाता है. कौन हैं वो? लेकिन जब खानदानी राजशाही के आगे कोई नही बोल सकता तब तक सब जायज है. खुशवंत सिंह शायद जानते हुए भी कह नही पा रहे हैं कि जब तक भारत में हिंदू संवेदनशील है तभी तक शौहार्द बना हुआ है. वरना यह और कहीं मुमकिन नही कि बहुमत वाली कौम के हितों को नजर अंदाज किया जाए, और अल्पमत वालों को वोट के दुकानदार दामाद कि तरह तरजीह देते रहें. आडवाणी पर जिन्ना प्रकरण को लेकर कोई लाख कीचड उछल सकता है, लेकिन तभी आडवानी के कुनबे की मुखिया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उनको दरकिनार कर के राष्ट्रीय इमानदारी का परिचय दिखाया था. कांग्रेस ऐसा कोई उदाहरण दे सकती है क्या. एक मसले पर कोर्ट से चार्ज शीट दाखिल होने पर आडवाणी ने ही कहा था, फैसला आने तक चुनाव नही लडूंगा, खुशवंत सिंह जी जिस पार्टी के पैरोकार बनकर बात कर रहे हैं, उसके दो-दो प्रधानमंत्री रिश्वतखोरी के इल्जाम में घिरे रहे. आडवाणी पर ऐसा कोई इल्जाम तो नही है.
कांग्रेस में सरदार पटेल सरीखा कोई नेता आज दीखता हो तो जरुर बताएं. अडवानी के सियासी सफर को देखते हुए लोग उन्हें सरदार पटेल के समकक्ष मान ने लगे हैं. देश पर किसको राज करना चाहिए खुशवंत जी? चार पैग चढा कर कलम चलाने वाले बुजुर्ग लेखक को राम मन्दिर मसले पर तो कुछ कहने से पहले सोचना चाहिए था.

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यह आलेख www.visfot.com पर भी प्रकाशित हुआ था। इस पर सुधि पाठकों ने जो प्रतिक्रियाएं दी हैं, उन्हें हूँ-बहू यहाँ दिया जा रहा है.
Vivek Gupta on 19 October, 2008

लगता है सम्पूर्ण लोकतंत्र एक व्यवहारिक परिकल्पना नहीं है


RAJKUMAR SINGH on 19 October, 2008

CHAR PEGEE SARDAR.KAUDEE BHAR SAROKAR.SANTA BATA THEME HAI DESH KAR RAHA HAHAKAR.


Sanjeev Sharma on 20 October, 2008

भाई प्रकाश जी,हालांकि आपकी चिंता जायज है किंतु शब्दों का चयन व्यवहारिक नहीं है। खुशवंतसिंह की सोच को पूरे समुदाय से न जोडें। लोग लाइमलाइट में आने के लिये कैसे कैसे शीर्षासन करते हैं सबको मालूम है पर उन्हें तव्वजो नहीं दी जानी चाहिये। हां! बकवास का विरोध अवश्य करना चाहिये लेकिन भाषा की शिष्टता तो बरकरार रहनी ही चाहिये।


संजय बेंगाणी on 20 October, 2008

खुशवंत सिंह को इतनी गम्भीरता से ले रहें है? !!


ता च चन्दर on 20 October, 2008

कॉंग्रेस(?)-मनमोहन-सोनिया से देश को और सामान्य जन को क्या मिला, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। सारा अर्थशास्त्रीपना कहां चला गया मनमोहन का और अनुभवी विद्वान वित्त मन्त्री क्यों कुछ नहीं कर पाए। रही बात खुशवन्त सिंह की, सो इस महान आदमी को इतनी गम्भीरता से लेने की क्या जरूरत थी जो इतना लिखने में सिरखपाई कर डाली। कुछ लोग मानते हैं-बदनाम होने में भी नाम होता है। इस उम्र में ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे- ऐसा सोचना भी मूर्खता है।


govind goyal on 20 October, 2008

khushwant singh se jo ummid aap kar rahen hain wah galat hai


दीपक on 21 October, 2008

यह तथ्य मुझे भी समझ मे नही आता की गांधी परिवार की अंधी भक्ती क्यो ? अभी राहुलगांधी को खुब प्रोजेक्ट किया जा रहा है ,पहले उन्हे अपने आप को सिद्ध तो करने दिजीये इतनी हडबडी आखिर क्यो ?


prakash chandalia on 21 October, 2008

भाई संजीव जीविस्फोट पर खुशवंत सिंह से सम्बंधित आलेख पर आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद्. बंधू आपने मेरे शब्दों के चयन पर एतराज किया है. यदि आपका इशारा सरदारों पर होने वाले चुटकुलों वाली बात पर है, तो यह बात मैंने इसलिए उठायी क्यूंकि खुशवंत जी ने ख़ुद अपने लेख में सरदारों पर होने वाले चुटकुलों के बारे लिखा था. अपने लेख में उन्होंने लिखा है की मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बन ने के बाद सरदारों पर बन ने वाले चुटकुलों में कमी आई है.


parshuram on 23 October, 2008

बहुत दिनों बाद अच्छा लेख पड़ने को मिला हा बस खुस्वंत जैसे बेवकूफ को सरदारों से जोड़ के चुटकला वाली बात ठीख नही है. कांग्रेस और बीजेपी की तुलना व्यर्थ है/ मनमोहन की advaniji से तुलना व्यर्थ है. हा लेख मैं तीखापन अच्छा लगा. खुशवंत जैसे को इस तरहे से जवाब जाता राहिना चाहिय


sanjay sen sagar on 25 October, 2008

prakashi ji ka lekh pada kafi pasand aaya ishliye apne blog par prakasith kiya hai .....visfot ko dekha to such aisa laga ki yah ek accha manch hai jo har ek pathak ki bhavnaon ki poorti karta hai