मुक्तक
मेरी बिटिया मुझे जब प्यार से बाबा बुलाती है
औ तुतले बोल से प्यारी कथा दिन की सुनाती है
मैं सब कुछ भूलकर अपने,नए एहसास गढ़ता हूं
उम्मीदों के नए झूले,प्रकृति खुद झुलाती है
कुंवर प्रीतम
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