हाय,शहर का जीवन कैसा दुर्गम और दुश्वार हुआ
कदम कदम पे पंगा है,हर शख्स यहां लाचार हुआ
दो पैसे की खातिर बुनते झूठ का तानाबाना सब
नहीं किसी से नाता भइया,हर रिश्ता बाजार हुआ
कुंवर प्रीतम

0 comments: