जरा सी बात पे नाराज,मेरे यार क्या होना
गुलों की क्यारियों में बीज क्योंकर खार के बोना
करम सदियों किए होंगे,तभी प्रीतम मिला तुमको
कुंवर को भूल मत साथी, पड़ेगा उम्र भर रोना
कुंवर प्रीतम
मिलन की चाहतों में दिन भला हम कब तलक काटें
फरेबी वायदों का गम कहो,कहकर किसे बांटे
इलाही तल्खियां उसकी कहर ढातीं गजब मुझ पर
पेंचोंखम मुहब्बत के, बताओ किस तरह पाटें
कुंवर प्रीतम
नींद नहीं आती, लोरी आज सुना दे फिर मैय्या
हरसू जख्मी मंजर,लोरी आज सुना दे फिर मैय्या
आंख लगे तो दहशत बम की,छा जाती है ख्वाबों में
परियां, चांद, सितारे वाली लोरी आज सुना दे मैय्या
कुंवर प्रीतम
पहेली बनके हमारे सामने जो शख्स खड़ा है
दो वक्त की रोटी के लिए सालों लड़ा है
दिखता है फटेहाल औ छत भी नहीं सर पे
कुंवर की नज़र में शख्स संसद से बड़ा है
कुंवर प्रीतम
मेरी बिटिया मुझे जब प्यार से बाबा बुलाती है
औ तुतले बोल से प्यारी व्यथा दिन की सुनाती है
मैं सब कुछ भूलकर अपने,नए एहसास गढ़ता हूं
बिटिया खुद मुझे झुले खयालों के झुलाती है
कुंवर प्रीतम
मस्त फकीरा जीवन है,पर ख्वाब सुहाने रखता हूं
अपने पुरखों की तहजीबें,मैं सिरहाने रखता हूं
जिसको शोहरत कहते हो तुम,वो मेरे पैताने में
अपने दिल की कुटिया में कई राजघराने रखता हूं
कुंवर प्रीतम
बताएं यार क्या तुमको, हमारे गांव की मस्ती
हरेक त्योहार पर खलती हमारे गांव की मस्ती
शहर में हम भले लाखों बरत लें जेब से अपनी
मगर गुलजार जेहन में ,हमारे गांव की मस्ती
कुंवर प्रीतम
गणपति बप्पा, सुनो ध्यान से घर तो सबके आना
लेकिन लोकपाल का डर है, लड्डू कम ही खाना
लेन-देन का टेंडर अबकी, कम ही तुम भरवाना
वरना तय है फिर अनशन पर अन्नाजी का आना
सवामणि के चक्कर में जो फंसे अगर लम्बोदर तुम
तय मानो फिर आरटीए के पंदे में फंस जाना
कुंवर प्रीतम
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