लो आज प्रशस्ति पढ़ देता हूं,तेरे मन की कह देता हूं
धनवान बहुत,विद्वान बहुत जलवे हैं यार जमाने में
नोटों की गिनती कौन करे,रक्खे जो राजघराने में
गाड़ी इतनी कि महीनों में एक बार कदम ना पड़ पाएं
रूतबा इतना कि सात जनम,कोई न वहां तक चढ़ पाए
क्या और कहूं मैं तेरी तो,जग में न कोई सानी तेरा
पर बात कहूं मैं एक खरी,मन बोझिल है प्रिय आज मेरा
जिस भूमि पर तू जन्मा औ जिस मां ने कोख में था पाला
क्यूं खबर न ली उन मांओं की,जिनपे ये शान टिकी लाला
कुंवर प्रीतम
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